शुभं करोति कल्याणं कलनग्यं धनसम्पदा। शत्रु बुद्धिनविनाशाय दीपज्योतिरनस्तुते ।।

Monday, May 27, 2019

May 27, 2019

Fake love

                                                                       बनावटी प्रेम


बनावटी प्रेम या दिखावे का प्रेम या वह प्रेम है जो एक मीठी छुरी और तिथि वार है जिसमें इंसान का हलाल होता ही है बहुत कम ऐसे व्यक्ति हैं जो इस मीठी छुरी से बच जाता है इस प्रेम में सब कुछ दिखावा होता है छल कपट धोखा से लूटपाट मर्डर बलात्कार षड्यंत्र सब कुछ भरा पड़ा होता है किंतु मनुष्य इस टाइप के प्रेम की ओर जल्दी आकर्षित हो जाता है क्योंकि अधिकतर लड़का और लड़की चमक के पीछे भागते हैं जिसके कारण वह किसी के जाल में बड़ा आसानी से फंस जाता है और वह व्यक्ति अपनी इच्छा अनुसार उसका प्रयोग करता है वह सामने से तो मुस्कुराता है किंतु भीतर उसके एक षड्यंत्र चलता रहता है कि इसे आगे कहां तक ले कर जाना है और कहां पर छोड़ना है इसके साथ क्या करना है इससे क्या पाना है इसे क्या देना है यह सब कुछ एक षड्यंत्र के मुताबिक आगे चलता है मैं अब इसी प्रेम के बारे में आगे चर्चा कर रहे हैं



इस प्रेम में कई बिंदु होते हैं जो कुछ इस प्रकार है जरूरत, हवस, बदले की भावना, षडयंत्र ,कुछ पाने की लालसा कुछ मकसद मतलब यूं कह लें कि दुनिया की सारी बुराइयां इस में कूट-कूट कर भरी पड़ी रहती है बस यदि आप इस का निचोड़ निकाले तो  इस प्रेम में लोग यदि पाते हैं तो उसका एक ही कारण होता है लालच और हवस कुछ तो  जल्दी बड़ा बनने की लालच होती है तो कुछ को अपनी हवस मिटाने की चाहत होती है इसी लालच और हवस में वह चमचमाते हुए चेहरे के पीछे भागते हैं ताकि उसे ऐसा लगता है कि उसका सारा जीवन इसके द्वारा सुखमय  हो जाएगा
 किंतु जब उसे झटका लगता है तो मानो ऐसा झटका लगा हो कि पूरी शरीर एक झटके में दुआ बन गया सब कुछ लुट जाता है और बर्बाद हो जाता है फिर भी लोग इस टाइप के प्रेम में फंसते रहते हैं


यह प्रेम ज्यादातर स्त्रियों के लिए खतरनाक होता है इसलिए स्त्रियों से हमारा यह अपील है कि आप जल्दी बड़ा बनने की चाहत या किसी से कुछ पाने की चाहत छोड़ दें आप जो कुछ पाना चाहते हैं वह अपने पराक्रम से प्राप्त करें क्योंकि आपका पराक्रम से प्राप्त हुआ कोई भी सुख  मैं इतना सुख जितना कि उस व्यक्ति के प्रेम में नहीं है वह व्यक्ति आपसे प्रेम तो नहीं कर सकता क्योंकि वह एक सौदा करता है कि मुझे यह मिलेगा तो मैं तुम्हें यह दूंगा इसलिए इस तरह के प्रेम में या इस तरह के प्रेम से स्त्रियों को हमेशा सावधान रहना चाहिए क्योंकि स्त्रियों का इज्जत ही उसका सबसे मूल्यवान वस्तु होती है यदि वह एक बार खो जाता है तो उसे प्राप्त करना उसके लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है या फिर यूं कह लें कि वह उसे कभी प्राप्त कर ही नहीं किया सकता क्योंकि यह असंभव है



इस प्रेम से पुरुषों को नुकसान तो होता है किंतु पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को अधिक नुकसान होता है क्योंकि समाज फिर उसे अपनाना नहीं चाहता और यह उसके जीवन में एक कांटा बन जाता है जिसके कारण उसका सारा जीवन रोता हुआ व्यतीत होता है इसलिए इस टाइप की व्यक्ति से हर स्त्री को सावधान रहना चाहिए मैं यह नहीं कहता कि आप प्रेम ना करें आप प्रेम अवश्य करें किंतु नाप तोल के  करें देखभाल के करें कि मैं जिस लड़का से प्रेम कर रहा हूं क्या  वह वास्तव में मेरा साथ देगा या नहीं यदि नहीं देता है तो फिर आपका भी उसके साथ नहीं जाना चाइये


पर अब तक मैंने यह देखा है कि ऐसी लड़कियां हैं जो उस लड़के के पीछे भागते हैं जो निश्चित ही एक न एक दिन उसे धोखा दे देता है और उस लड़के को देखता तक नहीं है जो उसका सच्चा जीवन साथी है वह वास्तव मुझ से प्रेम करता है किंतु लड़कियां को चमक शौक उत्साह मान-सम्मान पद प्रतिष्ठा से ज्यादा लगाव होता है अपनी सुख को बहुत अधिक महत्व देता है और अपनी सुख को पाने की लालसा में उसे उस लड़के का वास्तविक रूप नहीं दिखाई देता है जिसके कारण वह उसके प्रेम जाल में फंस जाता है और कुछ दिन  के पश्चात उसका यह सारा भरम टूट जाता है फिर तो वह ना घर का रहता है ना घाट का   तो इस तरह की जीवन जीने से अच्छा है कि हम प्रेम  ना करें यही अच्छा विकल्प हमारे पास है यदि हम लड़कों की पहचान नहीं कर पाते हैं तो आप या  स्त्रियां प्रेम ही ना करें  क्यों की  जब हमारा  हंसता खेलता जीवन बर्बाद हो जाए तो हम क्यू करे अब आगे आपकी मर्जी है आपका जीवन है आप इसे जहन्नुम में डाले या जन्नत में ले जाए हमारा क्या हम तो केवल आपको इतना अवगत कराने के लिए यह लेख लिखा है
                                 जय वासुदेव श्री कृष्ण
May 27, 2019

Effects of Natural Love [Part-4]

                प्राकृतिक प्रेम का प्रभाव [भाग - ४  ]


जैसा मैंने पिछले अध्याय में बताया था कि कुदरती प्रेमाने की कोई अवस्था नहीं होती है वह मनुष्य के किसी भी अवस्था में आती है यह जरूरी नहीं कि वो जवानी में ही हो यदि वह बचपना जवानी या अधेड़ अवस्था में ना हुई तो बुढ़ापे में तो निश्चित ही होगी अब रही बात बुढ़ापे की तू जो बूढ़ा व्यक्ति होता है वह शरीर से तो बड़ा हो जाता है किंतु उसका मन वह 13 साल में ही अटका हुआ रहता है वह मन से अपने आप को जवान जोशीला समझता है भले वह शरीर से लाचार हो गया और इसका फायदा कुदरत बहुत अच्छी तरह से उठा लेता है इसी के कारण उसके जीवन में जीवन की अंतिम चरण में प्रेम दस्तक दे देता है और यह दस्तक ऐसी दस्तक है जहां पर मनुष्य की जीवन का अंतिम चरण होता है वह कब कब्र में चला जाए यह कोई नहीं जानता किंतु फिर भी वह जीने की चाह में आता है और कुदरती प्रेम उसके ऊपर उस तरह ही प्रभाव डालती हैं जैसे एक जवान लड़के के ऊपर प्रभाव डालती है तथा यहां उस व्यक्ति की कोई गलती नहीं होती वह तो तेलुगु नी माया से बना हुआ है जो चाह कर भी कुछ कर नहीं पाता



प्रभाव :-अब यहां यह प्रश्न उठता है कि आप अरे उस पर अपना प्रभाव कैसे डालती है क्यों डालती है क्यों मनुष्य सब कुछ जानने के बावजूद भी यहां पर जाता है अर्थात मनुष्य समाज से जितना भी ज्ञान प्राप्त कर ले फिर भी वह कुदरत का आगे अज्ञानी ही है वह ना कभी कुदरत को जान पाया है ना कभी जान पाएगी इसी का फायदा कुदरत उठाती है और उसके जीवन में तू प्रेम भर देता वास्तु में प्रेम तो खराब है नहीं किंतु हमारा समाज प्रेम को एक समय सीमा तक ही बर्दाश्त करता है यदि समय से पहले आ जाए यह समय के बाद आ जाए तो फिर समाज उसे कभी बर्दाश्त नहीं करेगा किंतु मन और आत्मा की भूख ना मिटने पर मनुष्य की जो प्रमुख रूप होती है वह प्रेम का बुक होता है जिसे परमात्मा मिटाना चाहता है और परमात्मा उस भूख को मिटाने की चाहत में उसे प्रेम देता है किंतु तू प्रेम पाकर भी समाज से उसे संघर्ष करना पड़ता है सीधी उस प्रेम के आगे समाज का संघर्ष फीका पड़ जाता है इतना फीका पड़ता है कि उस मौज में उसे कुछ दिखाई नहीं देता ना समाज ना परिवार ना देश ना दुनिया बस वह चाहता है कि किसी तरह हम या हमारा जीवन आनंद से भर जाए और मैं इस संसार से मुक्त हो जाओ किंतु इतनी आसान नहीं है इस संसार से मुक्ति पाना



प्रभाव :-हम जिस समाज में रहते हैं उस समाज की ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो कभी प्रेम ना किया हो किंतु फिर भी वह प्रेम से उतना ही नफरत करता है जितना वह एक शत्रु से नफरत करता है अब वह क्यों नफरत करता है यह वही जाने उसे ऐसा प्रतीत होता है कि प्रेम आने से सब कुछ छीन जाएगा या प्रेम एक बगावत का नाम है किंतु प्रेम परमात्मा को पाने का एक सरल  रास्ता है यहां पर मनुष्य की आत्मा तृप्त होती है फिर भी उसे पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है ऐसा संघर्ष कि समाज में बनी बनाई हुई मान प्रतिष्ठा सब कुछ मिट्टी में मिल जाता है अगर देखा जाए तो कोई भी व्यक्ति की आत्मा से पूछे कि क्या वह व्यक्ति गलत है तो वह कभी नहीं कहेगा किंतु अधिकतर व्यक्ति दिमाग से करते हैं इसलिए हर व्यक्ति को प्रेम गलत दिखाई देता है जो व्यक्ति गलत कहता है वह व्यक्ति यदि अकाउंट में आ जाए वह यह भी सोचता है कि शायद मुझे भी ऐसा प्रेम मिला होता



हमें क्या करना चाहिए:- या इस अवस्था में बहुत बड़ी प्रश्न है इस प्रश्न का उत्तर देना इतना सरल नहीं है क्योंकि बुढ़ापे में यदि कोई तमाचा  भी मारे तो आत्मा तब तक हिल जाता क्योंकि शारीरिक रूप से हम किसी भी परी तारना को नहीं संभाल पाते हैं हम शरीर  से इतना कमजोर होते हैं कि किसी को झेल पाना हमारे बस की बात नहीं है इसलिए इस जगह पर मनुष्य को हमेशा सावधानी पूर्वक जीना  चाहिए या फिर यूं समझ ले यह जो कुदरती प्रेम है यदि हम सूझबूझ कर चले तो यह पूछ दिन का ही है यह  हमेशा तो हमारे जीवन में रहेगी नहीं और ऐसे भी हमारा जीवन अंतिम चरण में है तो हम सावधानी बरते  तो समाज का थप्पड़ पड़ने  से भी हम बच  जाएंगे और अपने जीवन को आनंद  में बदल सकते हैं

                                   जय वासुदेव श्री कृष्ण

Sunday, January 27, 2019

January 27, 2019

Effects of Natural Love [Part-3]

                प्राकृतिक प्रेम का प्रभाव [भाग -३   ]


कुदरती प्रेम यदि बचपन में ना हुआ और ना ही जवानी में हुई तो यह निश्चित है कि वह अधेड़ अवस्था या बुढ़ापा में अवश्य होगी।  हम आप सभी लोग यह जानते हैं कि कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अधेड़ अवस्था में या फिर बुढ़ापे में भी प्रेम कर बैठते हैं। यह उनका गलती नहीं है यह प्रकृति का विशेष प्रभाव उसके मनोदशा पर पड़ती है। जिसके कारण उसे कुछ समझ में नहीं आता कि वह क्या कर रहा है बस उसे अपनी प्रेमिका ही दिखाई देती है जिसके लिए वह अपना पत्नी, बच्चा, घर ,परिवार सब कुछ छोड़ देता है। और अपने प्रेमिका के साथ हो जाता है। यह वास्तव में कुदरती प्रेम का अद्भुत प्रभाव है जिसे हम -आप या कोई और अभी तक समझ नहीं पाया कि यह अपना प्रभाव किस तरह डालता है हम लोग आधुनिक युग में जी रहे हैं फिर भी इस तरह की गलतियां कर बैठते हैं जिसका परिणाम बड़ा भयानक ही आता है।  इस प्रेम के कारण ही हमारा बना बनाया हुआ सब कुछ बिगड़ जाता है और हम सड़क पर चले आते हैं।



प्रभाव :-अधेड़ अवस्था वह अवस्था है जहां पर हम सब कुछ प्राप्त कर आनंद पूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं किंतु प्रकृति अपना प्रभाव हर पल हमारे ऊपर डालती रहती है। उनके प्रभावों में से एक प्रभाव कुदरती प्रेम है जो मनुष्य के जीवन में कभी भी किसी भी अवस्था में आ जाती है। जब यह आती है तो हम पर बड़ा ही जोशीला प्रभाव डालती है जिसके चक्कर में हम ना चाहते हुए भी आ जाते हैं। हम जानते हैं कि हम जो कर रहे हैं उसका क्या परिणाम आएगा फिर भी हम वही करते हैं जो हमसे प्रकृति करवाना चाहती है।  प्रकृति के प्रभाव में आकर हम प्रेम तो कर लेते हैं किंतु समाज हमारा बहुत दूर तक पीछा करती है और जब समाज हमें पकड़ती है तो वह सीधा हमारा कॉलर पकड़ती है ताकि हमारा बना बनाया हुआ मान-सम्मान सब कुछ मिट्टी में मिल जाता है।



इस अवस्था में हमें ना दौलत बनाने की लालच होती है क्योंकि हम वह जगह पा चुके होते हैं, ना ही हमें कामवासना की हवस होती है क्योंकि वह भी हम अपनी पत्नी के द्वारा प्राप्त कर लेते हैं।  फिर भी हम इस प्रकृति के अद्भुत प्रेम लीला में फस जाते हैं जिसकी कारण हमें बड़ी कीमत चुकानी पड़ती हैयह प्रेम हमारे जीवन में कुछ ही दिन रहता है और कुछ दिन में ही हमारा सब कुछ बर्बाद कर देता है क्योंकि अधेड़ अवस्था तक हम पहुंचते-पहुंचते एक प्रतिष्ठित व्यक्ति होते हैं किंतु इसके प्रभाव में आने पर हम अपनी प्रतिष्ठा को भी दांव पर लगा देते हैं।



 दुष्परिणाम :-हम लोग यह भली-भांति जानते हैं कि हमारा समाज इस तरह के प्रेम को बर्दाश्त नहीं कर पाता जिसके कारण हमें समाज में अपनी बनी बनाई हुई मान-सम्मान को खोना पड़ता है। जिसके कारण हम कहीं के नहीं रहते हैं हमारा घर परिवार पत्नी बच्चे सब कोई नफरत करने लगते हैं। हमारी अंदर की उस भावना को कोई नहीं समझ पाता है। ना समझने के कारण ही हमारा समाज हमें गलत  समझ लेता है जो हम ना चाहते हुए भी वह प्रेम कर बैठे इसलिए मेरा मानना है कि हमें इस अवस्था में सावधान हो जाना चाहिए प्रेम यदि बचपन में हो या जवानी में हो तो समाज कुछ हद तक बर्दाश्त करता है।  किंतु यदि अधेड़ अवस्था में हो जाए तो हमारा समाज  कदापि बर्दाश्त नहीं करेगा इसलिए अपने मन को अपने नियंत्रण में रखना जरूरी है यदि हम अपने पांच इंद्रियों को अपने बस में रखते हैं तो प्रकृति हम पर वह विशेष प्रभाव नहीं डाल पाते जिससे मेरा सारा जीवन आनंदमय से बीतता  है।



हमें क्या करना चाहिए:- मेरा मानना है कि इस अवस्था में हमें पूर्ण रूप से सावधान रहना चाहिए प्रकृति अपना प्रभाव एक निश्चित समय के लिए डालती हैं।  यदि हम धैर्य के साथ उस समय को पार कर लेते हैं तो हम इस गलती को करने से बच जाएंगे यदि फिर भी हम अपने आपको यदि काबू नहीं कर पाए तो हमें अपनी पत्नी बच्चा परिवार को कभी नहीं त्यागना चाहिए क्योंकि वास्तव में वही हमारा साथ रहेगा वही हमारा सेवा करेगा इसलिए सोच समझ कर यह निर्णय करें कि हमें प्रेम करना चाहिए या नहीं करना चाहिए जाने अनजाने में हम जो कुछ भी गलती करते हैं उसका परिणाम आगे जाकर हमें प्राप्त होता है किंतु हमें उन लोगों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए जो लोग हमारे  लिए हमेशा चिंता करते हैं।  क्योंकि कोई भी महल  बनाने में बड़ा ही एक लंबा समय और परिश्रम लगता है किंतु उसे  तोड़ने में या बिखेरने में बस कुछ पल ही लगता है इसलिए अपने बने बनाए हुए आशियाना को ना उखाड़े  अब आगे आपकी मर्जी आपकी जिंदगी आपके हाथ में ही हैं।

                                          बुढ़ापे की प्रेम कहानी हम आपको आगे  सुनाएंगे
                           
                                                             जय वासुदेव श्री कृष्ण 

Sunday, January 20, 2019

January 20, 2019

Effects of Natural Love [Part-2]

                 प्राकृतिक प्रेम का प्रभाव [भाग -२  ]


आज जिस युग में हम लोग जी रहे हैं उस युग के बच्चे 12 वर्ष की उम्र में जवान  हो जाते हैं। 12 से 25 वर्ष तक के उम्र में बच्चे या तो बहुत गंभीर होते हैं या फिर बहुत चंचल होते हैं।  यह हमारे जीवन का वह समय है जहां हमारा जीवन बनता और बिगड़ता है। यदि इस समय कुदरती प्रेम दस्तक दे दे तो फिर अपने जीवन को सही दिशा दे पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है क्योंकि यह वह समय है जब हम अपने जीवन को संवारने में लगे रहते हैं और यदि किसी से प्रेम हो जाए तो हमारा सारा ध्यान उस और चला जाता है जिसके कारण हम अपने जीवन में कुछ करने से चूक  जाते हैं अंत में वह हाल होता है कि हम ना ऑफिसर के काबिल रहते हैं और ना ही मजदूरी करने के लायक।  रही बात प्रेम की तो वह सावन के झूलों की तरह होता है जो एक निश्चित समय के लिए आता है और फिर चला जाता है पर इसका छाप हमारे पूरे जीवन पर पड़ता है।



प्रभाव:- जब जवानी में हमें किसी से प्रेम हो जाए तो यह हमारे ऊपर दो तरफा वार करता है। एक वह जिसे हम अपने दिल से लगा लेते हैं जिसके आगे दुनिया की हर चीज़ फीकी हो जाती है। और हम यही सोचते हैं कि मेरा सारा जीवन यूं ही चलता रहेगा पर ऐसा होता नहीं है दूसरी ओर हमारा सेक्स हमारे ऊपर इस कदर हावी होता है कि भूतनी भी हमें परी दिखाई देती हैं वह सेक्सी ही हैं जो हमें रंग बिरंगा सपना दिखाता है वास्तविक दुनिया से निकल  कर हम कल्पना के दुनिया में चले जाते हैं।


इस समय हमारा जीवन का दशा-दिशा कुछ और होता है। हम बड़े उमंग और उत्साह में होते हैं और यदि प्रेम मिल जाए तो हमारा उमंग और उत्साह सातवां आसमान पर पहुंच जाती है। जिसे हमारे जीवन को संवारने या कामयाबी की बुलंदी को छूने में लगाना चाहिए था। हम उस उमंग उत्साह को प्रेम में लगा देते हैं जिससे हमारे जीवन की महत्वपूर्ण समय प्रेम के चक्कर में हमारे हाथों से निकल जाती है


जवानी की उबाल के कारण हमारे ऊपर प्रेम बुरी तरह हावी रहता है जिसके आगे हमें ना कुछ दिखाई देती है ना कुछ समझ में आता है। लगता है कि सारा जीवन यूं ही रोशन रहेगा किंतु ऐसा होता ही नहीं है क्योंकि परिवर्तन ही संसार का नियम है हर एक वस्तु अपने निश्चित समय के उपरांत परिवर्तित हो जाती हैं। उसी तरह हमारी भावना भी एक निश्चित समय के अंतराल पर परिवर्तित हो जाती हैं किंतु यह प्रेम हमारे शरीर पर ना वार करके हमारी भावनाओं पर वार करता है जिसका छाप पूरे जीवन पर पड़ता है। जब भी हम कहीं में एकांत बैठते हैं तो हमें वह प्रेम की दो पल याद आते हैं और हम यही सोचते हैं कि काश वैसा ही हमारा सारा जीवन होता है। किंतु ऐसा होता नहीं फिर भी हम क्यों उस आग में अपने जीवन की अनमोल समय को झोंक  देते हैं। जिसके बदले में हमें कुछ प्राप्त नहीं होता और अंत में ठोकरें खाते फिरते हैं। इससे भला होता कि हम प्रेम ना करते हैं किंतु हम करें भी तो क्या कर सकते हैं कुदरती प्रेमी को कोई नकार नहीं सकता यह सत्य है जो हर मनुष्य के जीवन में एक बार आताअवश्य है।



दुष्प्रभाव:- इसका दुष्प्रभाव यह होता है कि अंत में हमारे पास ना प्रेम होता है। और ना ही हम कुछ करने के लायक बचते  हैं क्योंकि जो उमंग उत्साह हमारे जीवन को संवारने में लगाना चाहिए था। वह उमंग उत्साह प्रेम में लगा दिए और अंत में प्रेम भी हमें छोड़ कर चला जाता है। जिसका दुष्प्रभाव हमें सारा जीवन भर झेलना  पड़ता है अर्थात हमने प्रेम के चक्कर में आकर पढ़ाई लिखाई कुछ इस तरह की कि हम ना ऑफिसर बन पाए और ना ही मजदूर बन पाए हैं वाह रे प्रेम बस अब नमक रोटी की तलाश में ठोकर खाते से फिरते  हैं कि दो वक्त की रोटी मिल जाए, तन ढकने का वस्त्र मिल जाए, सर ढकने का छत मिल जाए किंतु यह सब चीज इतनी आसानी से नहीं मिलती है यह सब चीज को पाने के लिए एक लंबे समय तक परिश्रम करना पड़ता है और जब हमें परिश्रम  करने का मौका मिला तब हम रंगरेलियां कर रहे थे ऐसी रंगरेलियां की कि हमें आज ठोकर खाना पड़ रहा है। वाह रे प्रेम अद्भुत है तेरी माया।



हमें क्या करना चाहिए:- कुदरती प्रेम जब हमारे जीवन में आती है तो यह बड़ा गहरा प्रभाव डालती है हम ना चाहते हुए भी इस के चक्कर में फस जाते हैं क्योंकि यह सीधा हमारे मनोदशा को प्रभावित करती है जिसके कारण हम आकर्षित हो जाते हैं। और अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय गंवा बैठते हैं तो हमें क्या करना चाहिए कि यह हम पर अपना प्रभाव डाले और जिससे हमारा महत्वपूर्ण समय बर्बाद ना हो तो हमें दोनों में तालमेल बिठा कर आगे बढ़ना चाहिए जिससे हम प्रेम का भरपूर आनंद ले सके और अपने कैरियर को भी कामयाबी की ऊंचाई तक पहुंचा पाए। क्योंकि हम या भली-भांति जानते हैं कि प्रेम सदा हमारे जीवन में नहीं रहेगा यह आज है तो कल चला जाएगा इस बात की गांठ बांधकर हमें सावधान हो जाना चाहिए


यदि हम कुदरती प्रेम से भागते हैं या अपना दामन छोडाते हैं तो यह संभव नहीं है क्योंकि या कुदरत के द्वारा तय किया हुआ चक्रव्यूह है जिसे भेदने  का हमारे पास कोई तरीका नहीं है यदि हम इससे पीछे की ओर भागे हैं तो यह हमारे ऊपर और अधिक तेजी से वार करेगा और जब यह तेजी से वार करेगा तो जो बर्बाद होने में 2 साल लगती है वह 2 दिन में ही हो जाएगा इसलिए प्रेम का आनंद भी ले और अपना कैरियर को भी साथ साथ लेकर चले जिससे हमें आगे जाकर ठोकर ना खाना पड़े
                                                           अब अधेड़ की प्रेम कहानी हम आगे सुनायेंगे 
                                                                        जय वासुदेव श्री कृष्ण

Sunday, January 6, 2019

January 06, 2019

Effects of Natural Love [Part-1]


                  प्राकृतिक प्रेम का प्रभाव [भाग -१ ]


प्रेम  एक अनुभव का नाम है जो प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता है।  जो हर किसी के जीवन में आता जाता रहता है। यदि हम इसके प्रकार को देखें तो यह मुख्य दो प्रकार की होती हैं।  एक कुदरती प्रेम और दूसरा स्वार्थी प्रेम कुदरती प्रेम को कुदरत तय करता है कि आपको प्रेम किससे होगी कब होगी कैसे होगी दूसरी और स्वार्थी प्रेम को मनुष्य अपने स्वार्थ  के मुताबिक किसी से प्रेम करता है।



कुदरती  प्रेम मनुष्य के जीवन में कभी किसी भी स्थिति में आ सकती हैं। हमें यह जानना जरूरी है कि हमारे जीवन में यह क्या प्रभाव डालती हैं इसका क्या दुष्प्रभाव होता है। जब हमारे जीवन में यह होती है तो हमें उस वक्त क्या करना चाहिए जिससे हमारा नुकसान भी ना हो और हम प्रेम का भरपूर आनंद ले सकें इसके परिणाम को जानने के लिए मनुष्य जीवन जीवन को चार चरणों में विभाजित करके देखते हैं।



१ / बचपना :-कुदरती प्रेम जरूरी नहीं कि वह आपके जवानी मैं हो यह आपके बचपन के जीवन में भी दस्तक दे देती है। और जब या हमारे बचपन के जीवन में आ जाए तो इसका क्या प्रभाव होगा क्या दुष्प्रभाव होगा उस समय हमें क्या करना सही है। आइए जानने की कोशिश करते हैं।



प्रभाव :- बचपन का जीवन एक निर्दोष पूर्ण जीवन होता है।  इस समय हमारा दिमाग बिल्कुल खाली होता है।  इस समय यदि कुदरती प्रेम हो जाए तो फिर इसका प्रभाव हमारे सारे जीवन पर पड़ता है।  क्योंकि कुदरती प्रेम बहुत ही प्रभावशाली होता है। जो हमारे जीवन की दशा और दिशा बदल देते हैं जैसे मीराबाई इनको बचपन में ही प्रेम हुआ था जिससे इनका जीवन का दशा और दिशा पूरा ही बदल गया यह बात हम आप क्या सारा संसार जानता है।  जिसे हमारा समाज ने एक अलौकिक प्रेम का नाम दिया है। ऐसे तो कुदरती प्रेम एक अलौकिक प्रेम ही होता है जो जीवन के किसी भी पड़ाव में हो सकता है यह जीवन की उमर को नहीं देखती है।



दुष्प्रभाव:- जब इस प्रकार का प्रेम हमारे जीवन में होता है तो हम मनुष्य जीवन की मुख्यधारा से कट जाते हैं। और मुख्यधारा से कटने के कारण हमारे ऊपर के प्रकार के लांछन लगना शुरू हो जाता है।  समाज की ओर से हमें प्रताड़ित किए जाने लगता है।  फिर भी हम इस प्रेम के प्रभाव में रहने के कारण हमारे ऊपर न  लांछन का  प्रभाव पड़ता है।  और ना ही हमें प्रताड़ित होने का भय होता है।



हमें क्या करना चाहिए:-  जब कुदरती प्रेम हमारे जीवन में आ जाए तो हमें जीवन को संतुलित करके आगे बढ़ना चाहिए।  ताकि हम प्रेम का भरपूर आनंद ले सकें और मुख्यधारा से भी ना कटे।  यदि आप सोचते हैं कि मैं प्रेम ही ना करूं तो ऐसा हो नहीं सकता है।  क्योंकि कुदरत के प्रभाव को काटने की सत्ता आपके पास है ही नहीं।  यह कुदरत पर निर्भर करता है कि यह  प्रेम आपके जीवन में कब तक रहेगा।  यह किसी के जीवन में जीवन भर या कुछ समय तक या कुछ पल के लिए ही रहता है। किंतु मैं आपको यह भी बताना चाहूंगा कि कुदरती प्रेम में मिलन नहीं होता है। आप कोई भी प्रेम ग्रंथ उठा कर देख सकते हैं और मिलन ना होने के कारण यह अत्यंत प्रभावशाली होता है। जिसके कारण आकर्षण का प्रभाव बना रहता है।


                                                                   जय वासुदेव श्री कृष्ण

Sunday, December 23, 2018

December 23, 2018

Merit of success


                                           सफलता के गुण



इस जगत में हर कोई सफल होना चाहता है पर उसमें किसी को सफलता मिलती है। तो कोई असफल हो जाता है जो सफल है वह तो ठीक है उसका उद्धार हो गया पर जो असफल है उसका क्या उसे कैसे सफलता मिलेगी उसने कहाँ चुक की जो असफल हो गया हैं। जीतने भी सफल व्यक्ति हैं उसमें विशेष पाँच गुण पाए जाते हैं और वह उसे उसी पाँच गुण के बदौलत सफल हुए हैं। अर्थात हमें भी सफल होने के लिए उस पांच गुणों को धारण करना होगा तभी हम सफल हो पाएंगे तो वह पाँच गुण क्या है।  तो वह पाँच गुण धर्म, समर्पण, धैर्य, प्रेम और न्याय है। यदि इसे हम ग्रहण कर ले तो हमारी सफलता निश्चित है किंतु धारण करने से पूर्व हमें अर्थ जानना अनिवार्य है।  यदि हम उसका अर्थ नहीं समझेंगे तो उस गुण या शक्ति का प्रयोग सही रूप में नहीं कर पाएंगे तो इसका अर्थ समझने का प्रयास करते हैं



धर्म:- धर्म शब्द जब हमारे सामने आता है तो हम किसी विशेष समुदाय की ओर इशारा करते हैं जैसे हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई इत्यादि  तो क्या इसे हम अपना धर्म मान ले या फिर विचार करें कि मेरा धर्म क्या है।  धर्म का वास्तविक अर्थ होता है कि हम जो कार्य कर रहे हैं वह कहां तक उचित है और कहां तक अनुचित है इसे ही धर्म कहते हैं किंतु हम कैसे जाने कि  क्या उचित है या अनुचित है हमें कौन बताएगा तो जनाब आपका धर्म का निर्णय करने वाला आपके भीतर बैठा हुआ है जब आप कोई कार्य करते हैं तो यदि वह कार्य गलत हो तो आप के अंदर से यह इच्छा प्रकट होती है कि नहीं यह कार्य सही नहीं है अर्थात आपका धर्म आपको निर्णय दे दिया है फिर भी आप किसी से प्रभावित होकर या स्वार्थबस होकर कार्य करते हैं जिसको आपका धर्म इंकार कर चुका है फिर भी आप करते हैं और असफ़ल होते हैं।  यदि आप अपने धर्मों को समझ लेते हैं तो सफलता निश्चित ही मिलती और असफ़लता मनुष्य को तभी मिलती है जब वह अपने धर्म के विपरीत कार्य करता है।



समर्पण:- समर्पण वह भाव है जो व्यक्ति को सफलता दिलाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आप जिस कार्य में सफल होना चाहते हैं उसके प्रति आप समर्पित नहीं है तो सफलता की आशा आप कैसे रख सकते हैं। आप जिस कार्य में अपने आप को जितना समर्पित करेंगे उतना हीआपको सफलता मिलेगी समर्पित करने से पूर्व यह विचार कर ले कि आप जिस कार्य के प्रति समर्पित हो रहे हैं क्या वह मेरा ही धर्म है या फ़िर दुसरे से प्रभावित होकर समर्पित हो रहे हैं तो यदि वह आपका धर्म है तो निश्चित ही सफलता मिलेगी वह भी बिना सहायता की अगर वह आपका धर्म नहीं है और आप औरों से प्रभावित होकर  समर्पित हो रहे हैं तो आप सफल नहीं हो पाएंगे क्योंकि आपके मन में नौ -छो लगी रहेगी तो फिर आप सफल कैसे हो पाएंगे जब आपका विश्वास ही डगमगा रहा हो  इसलिए सफल होने के लिए अपनी धर्म की सुने तभी आप पूर्ण समर्पण कर पाएंगे।



प्रेम :- प्रेम का मतलब तो आप जानते होंगे और यह सब के पास है किसी के पास ज्यादा तो किसी के पास कम है।  किंतु प्रेम करना एक अलग बात है और प्रेमपूर्ण होना एक अलग ही बात है। जो प्रेम करते हैं उसे अंत में निराशा हाथ लगती हैं क्योंकि उसने प्रेम नहीं किया है लगाव रखा है और ऐसे लगाव रखा कि यदि वह हाथ से निकल जाए तो मानो उसके ऊपर कोई पहाड़ टूट जाता है। और जब पहाड़ टूटता है तो फिर वह और किसी से प्रेम नहीं कर पाता है निराशा उसे ऐसे जकड़ लेती हैं कि द्वारा प्रेम उत्पन्न होने नहीं देता जिससे उसे असफलता हाथ लगती है।


और प्रेमपूर्ण होना सफलता का राज है जो व्यक्ति प्रेमपूर्ण होते हैं उसे किसी प्रकार हताशा निराशा नहीं पकड़ता और समय के साथ वह भी परिवर्तित हो जाता है। और जो समय के साथ परिवर्तित होता है तो उसे सफलता मिलना स्वाभाविक है।  इसलिए हमें हमेशा समय के साथ चलना चाहिए समय यदी हमसे आगे निकल जाए तो भी हम असफल कहलाते हैं या पीछे छूट जाए तो भी हम असफल कहलाते हैं। इसलिए समय के साथ-साथ चलें और समय के साथ-साथ प्रेमी नहीं प्रेमपूर्ण ही चल सकते हैं। जो प्रेमपूर्ण नहीं है वह समय के साथ नहीं चल सकता यदि हम समय के साथ चलते हैं और समय हमारा साथ चले तो फिर कौन हमें सफल होने से रोक सकता है।



धैर्य :- आज जिस युग में हम चल रहे हैं जहां नींद में भी इंसान तोड़ता है। इतनी जल्दी लगी हुई है कि 12 घंटे की रात को वह चाहता है कि 1 घंटे में सुबह हो जाए जो संभव ही नहीं है। तो बिना धैर्य का सफल होना कैसे संभव है यह प्रकृति अपने नियम अनुसार चलती है तो रात से सुबह होने में जो समय लगता है उस समय आप अपने अंदर धैर्य का धारण करें धैर्य के अलावा यदि आप इधर उधर हाथ पैर मारेंगे तो केवल आपको परेशानी ही मिलेगी सफलता नहीं।


उसी प्रकार जब हम किसी कार्य के लिए मेहनत करते हैं तो हम सफल होना शुरू से ही चाहते हैं। जिसके कारण विफल हो जाते हैं यदि हम कार्य करते जाएं और सुबह होने तक धैर्य रखें तो सफलता अवश्य मिलेगी। पर मनुष्य अपने कार्य  से ज्यादा अपने कार्य के परिणाम पर ध्यान देता है। जिससे वह जीस परिणाम का आशा करता है वह उसे मिलता नहीं है कारण उसका ध्यान परिणाम पर था कार्य पर नहीं यदि वह धैर्य को धारण करता तो उसका ध्यान कार्य पर होता अपने कार्य के परिणाम पर नहीं और फ़िर अपने कार्य के परिणाम के रूप में सूर्य उदय को देखता।



न्याय :- सफल होने के लिए न्यायवान होना जरूरी है अब न्याय किसके साथ किया जाए तो अपने साथ यदि आप  अपना न्याय करने में सफल हो गए हैं।  तो आप सभी का न्याय कर पाएंगे क्योंकि दूसरों का न्याय करना बड़ा आसान है दूसरों की भावनाओं को हम समझ नहीं पाते हैं इसलिए बड़ी आसानी से उसका न्याय कर देते हैं वह जो  महसूस कर रहा है यह जरूरी नहीं कि हम भी वही महसूस करें ऐसा संभव नहीं है क्योंकि सब की भावना अलग अलग होती है इसलिए पहले अपनी भावनाओं को समझें तभी आप दूसरों की भावना समझ पाएंगे यहां हर व्यक्ति अपने साथ अन्याय करके बैठा हुआ है जिसके कारण उसे असफलता  मिलती रहती है।  यदि वह अपने साथ न्याय किया होता तो आज वह असफल नहीं होता।  आज के दौर में मनुष्य अपने से ज्यादा दूसरों की गलतियों को गिनने में लगा है और जब अपनी बारी आती है तो सारी हवा निकल जाती है जिसके कारण वह अपने साथ ही अन्याय कर बैठता  है जो उसे एक कदम पीछे धकेल देता है।


जैसे मान लीजिए कि  x को  सोने की इच्छा और y  को जागने की इच्छा है तो x अपनी विरुद्ध होकर y  के साथ बैठ गया और x  को नींद आ रही है तो वह ना y  के साथ बैठ पा रहा है और ना ही सो पा रहा है अर्थात वह अपना नींद तो खराब किया ही और y  का जागना भी खराब कर दिया था वह दोनों जगह विफल हो गया यदि वह अपने साथ न्याय करके  सोया हुआ होता तो ना वह विफल होता और ना ही y विफल होता।

                                                      जय वासुदेव श्री कृष्ण

Sunday, December 16, 2018

December 16, 2018

Scandal and woman

                                              लांछन और स्त्री 

लांछन मनुष्य पर अपने कर्मों के अनुसार लगता है किंतु कुछ ऐसे लांछन  है जो अर्थहीन है जिसका कोई मतलब नहीं है यह समाज के द्वारा लगाया जाता है और जिस व्यक्ति पर लगती है उसकी  मानसिकता बदल देती है या फिर यूं कह ले कि यह किसी को प्रताड़ित करने का एक तरीका है जो हमारे समाज के विकास के लिए अवरोध हैं।


पुरुष की तुलना में स्त्रियों पर लांछन अधिक लगती है जो एक पारम्परिक लांछन बन गया है जैसे अभागन,कुलक्षण,बांझ  यह ऐसे लांछन हैं जो स्त्रियों पर लगती आई है।  यह लांछन लगने पर स्त्रियों का जीवन नर्कमय हो  जाता है जो हमारे संसार को सवारता है उसी को प्रताड़ित करने का एक अच्छा बहाना समाज ने बना कर रखा है जो अर्थहीन है जिसका वास्तविक जीवन से कोई लेना देना नहीं है जिसका मैं व्याख्या कर रहा हूं।


अभागन :-  जब स्त्रियां कुमारी होती है तब यह लांछन उसके माता-पिता, भाई-बहन, गोतिया और समाज के द्वारा लगाकर उसे प्रताड़ित किया जाता है।  जब स्त्रियों का विवाह होने में देर हो जाते हैं या उनके माता पिता भाई-गोतिया उसका बर ढुढने में असमर्थ हो  जाता है। तब उसका एक नया नाम रख दिया जाता है अभागन और यह लांछन  उस स्त्री पर इतनी बुरी तरह हावी होता है कि उसका हंसता खेलता जीवन खामोशी में सिमट जाता है।  उसके दिलो दिमाग पर यह लांछन प्रभावी रूप से काम करता है और वह औरों की तुलना में अपने आप को एक लाचार और बेबस पाता है। और इस लाचारी का फायदा कोई होशियार बड़ा आसानी से उठा लेता है। और यही से उस स्त्री का दुर्भाग्य शुरू हो जाती है जो आगे चलकर उसके जीवन को तहस-नहस कर देता है जिससे वह ना घर का रहता है और ना घाट का केवल एक लांछन उसके पुरे जीवन को बदल कर रख देता हैं।


फिर भी स्त्रियों को हम लोग प्रताड़ित करते रहते हैं। ऐसा थोड़ी है कि उसका विवाह नहीं होगा।  होगाअवश्य होगा जानते हैं क्यों क्योंकि परमात्मा ने ऐसा एक भी चीज नहीं बनाया है जिसका दूसरा भाग ना हो इस संसार में जितने भी वस्तु और प्राणी हैं उसका दो पहलू हैं अर्थात जोड़ा है। जैसे रात है तो दिन अवश्य होगी आम है तो ईमली अवश्य  होगी आप कहीं भी किसी भी तथ्य में नजर दौड़ाते हैं तो आपको जोड़ा मिलेगा ही मिलेगा यह प्रकृति की एक निश्चित सिद्धांत है जो अटल है।


अंत में  मैं यही कहूंगा कि स्त्रियों को इस लांछन से मुक्त करें जो हमारे समाज के विकास के लिए बहुत बड़ा अवरोध है।  स्त्रियां हमारे समाज का अभिन्न अंग है जिसके बिना यह संसार क्या परमात्मा भी अधूरा है।


कुलक्षण:- जब स्त्री की विवाह होती है तब वह अपना सब कुछ त्यागकर नया संसार बसाने की इच्छा से अपना ससुराल जाता है जहां दो चार महीने उसे खूब मान-सम्मान मिलता है। इसके बाद जब उस घर में तरक्की नहीं होती तो ससुराल वाले उसे कुलक्षण करार  दे देता है और कहता है कि इसके आने से हमारा घर का विकास रुक गया है अपनी और असामर्थ्य का दोष उस स्त्री के माथे पर थोप देता है।


अर्थात हमारे समाज ने उस स्त्री से धन वैभव की आशा रखता है। जब धन ही चाहिए था तब स्त्री से विवाह क्यों किया कोई बैंक से विवाह कर लेते तो धन ही धन होता यह भी कम पड़ जाए तो टक्साल से विवाह कर लेते हैं।  जहां बच्चे के बदले में नोट ही पैदा होता उसी के साथ घूमते उसी के साथ रहते हैं क्या बात है हमारा समाज ने एक स्त्री को धन पैदा करने वाली एक वस्तु समझ लिया है जिसे मान सम्मान देना चाहिए उसे प्रताड़ित करने का बहाना ढूंढता रहता है।


 कुलक्षण बोल कर उसे प्रताड़ित करता रहता है जबकि मुख्य दोष ससुराल वालों में है जो अपना विकास करने में असमर्थ हो जाता है। और अपनी असामर्थ्य को  छुपाने के लिए अपनी पत्नी, अपनी बहू, अपनी भाभी को आगे कर देता है और कहता है कि सारा दोष इसी का है।  इसे घर से निकालो जब तक यह हमारे घर में है तब तक हमारा विकास नहीं हो सकता। जब यह घटना आपकी बहन या बेटी के साथ होती है तो फिर आप की परिभाषा बदल जाती हैं और तुरंत आप नयालय का दरवाजा खटखटाने लगते हैं। ऐसा क्यों क्या हमारे समाज को मानसिक बीमारी पकड़ ली है। जो स्त्री को कई युगों से रोंधताआ रहा है अरे भाई अब तो बदल जाओ सब कुछ बदल रहा है पर हमारे समाज की मनोदशा नहीं बदल रही है अपने आप को ठीक कर लो बाकी सब ठीक है यदि हम अपने आप को भी बदल लिये तो फिर हमारा समाज समाज ना रह कर स्वर्ग बन जाएगा।


बांझ :-जब किसी स्त्री को बच्चा समय पर ना हो या शारीरिक कमी हो तो समाज उसे बांझ कहना शुरू कर देता है।और यहां तक कि घर परिवार के साथ-साथ आस-पड़ोस भी उससे घृणा करने लगता है। यदि सुबह-सुबह या कोई विशेष कार्य करने के लिए जा रहा हो तो निकलते समय उसका चेहरा नजर आ जाए तो कहता है कि मैंने बांझ को देख लिया अब मेरा काम सफल नहीं होगा जबकि वह कोशिश भी नहीं किया और अपनी असफलता का परिणाम उस स्त्री के माथे थोप देता है जिसका कोई कसूर ही नहीं है।


समय जब आगे तक निकल जाती है उस समय भी स्त्री एक बच्चा अपने परिवार को नहीं दे पाया तो पुरुष दूसरी विवाह कर लेता है। और पहली पत्नी को छोड़ देता है या फिर उसके साथ जानवरों से व्यवहार करता है आप जरा सोचें कि उस स्त्री पर क्या बीती होगी जो इस लांछन को झेलता है।


 यदि स्त्री के अंदर किसी प्रकार की कमी है तो उसे निश्चित ही पूरा किया जा सकता है क्योंकि हमारा विज्ञान इतना विकास कर लिया है कि वह धूल-मिट्टी से बच्चा पैदा कर दें तो हम और आप एक मनुष्य हैं। आपको अपनी स्त्री पर विश्वास नहीं है पर विज्ञान पर तो विश्वास है हमारे विज्ञान ने हमें क्या नहीं दिया है आज हमारे पास जो कुछ भी सुविधाएं हैं वह सब विज्ञान की ही देन हैं तो फिर आप विज्ञान का सहारा क्यों नहीं लेते आप विज्ञान युग में रहकर उस युग में जी रहे हैं जिस युग में जानवर जिया करते हैं।


इस प्रकार देखा जाए तो हमारे समाज में स्त्रियों की दशा दयनीय है और उसकी दयनी होने का उत्तरदायित्व हम और आप  हैं इसलिए हमारा कर्तव बनता है कि इस बुराई को समाज से निकाल कर फेंक दें क्योंकि हम मनुष्य हैं और मनुष्यता ही हमारा प्रधान गुण। हम क्यों उस सड़ी गली परंपरा को पकड़ कर रखे हैं जो हमारे समाज को दीमक की तरह चाट रहा है स्त्रियां हमारे समाज का अभिन्न अंग है इसे अलग नहीं किया जा सकता है हम आपको यह याद दिला दें कि जब जब किसी स्त्री को प्रताड़ित किया गया है तब-तब एक परिवार नहीं, एक गांव नहीं ,एक राज्य नहीं पूरा राष्ट्र उखड़ गया है।

                                                             जय वासुदेव श्री कृष्ण 


Saturday, December 8, 2018

December 08, 2018

What is destiny?

                                                नियति है क्या 

जब किसी के साथ कोई घटना घटती हैं तो वह कहता हैं की यही मेरा नियति है हम क्या कर सकते हैं यह परमात्मा के मर्जी से हुआ हैं ऐसा क्यू कहता हैं और सारा दोष नियति पर ही क्यू डालता हैं। नियति वास्तव में होता क्या हैं और यह कैसे कार्य करती हैं। आइए जानने का कोशिश करते है।


हमारी नजरो में नियति है क्या हैं यह में आपको सधारण भाषा मैं समझाने की कोशिस करूँगा। जो मैं अब तक समझ पाया हूँ जहाँ तक मुझे समझ मैं आया हैं।  यह जरुरी नहीं हैं की मैं जो कह रहा हूँ वह सत्य हैं यह आपके बिवेक पर निर्भर करता हैं की आप किसी तथ्य को कैसे देखते हैं।


परमात्मा :- यह ईश्वरीय प्रोग्राम है जो एक नियम के द्वारा चलती है या फिर यूं कह ले की संपूर्ण विश्व एक नियति हैं और इस नियति के अंदर अनंत नियति है जिसकी गणना हम आप या कोई और नहीं कर सकते हैं।  यह हमारी बुद्धि ज्ञान से परे हैं क्योंकि हमारी बुद्धि और ज्ञान की सीमा प्रकृति के द्वारा निश्चित कर दी गई है।  जैसे मान लीजिए कि हम किसी उड़ती हुई पंछियों को देख रहे हैं और हम उसे वहीं तक देख सकते हैं जहां तक देखने की क्षमता हमारे पास है उससे आगे हम नहीं देख सकते हैं और वह पक्षी उड़ती हुई कुछ दूर चली गई इसका मतलब यह नहीं कि वह पंछी आगे उड़ नहीं रही है वह उड़ रही है पर हमारे आंखों की इतनी क्षमता नहीं है कि हम उसे आगे तक देख सके इसी तरह नियति को समझने की जो विवेक हमारे पास है उसकी अपनी एक सीमा है और उस सीमा से हम आगे नहीं जा सकते हैं। हां उसे अनुभव अवश्य कर सकते हैं पर अनुभव हम तभी कर सकते हैं जब हम अपने आप को शून्य कर ले शांत हो जाए तो फिर वह सब संभव है जो हमारे ज्ञान से परे हैं। हम अपनी भौतिक शरीर में रहकर उस परे तक जा सकते हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते है। वहाँ तक जाने के लिए हमें अपने आप को इस नियति के प्रति समर्पित होना होगा अर्थात अपने आपको ईश्वर बनाना होगा जहाँ तेरा -मेरा, अपना -पराया, लाभ -हानि, मोह, अहंकार इत्यादि गुणों को समाप्त करना होगा तभी ईश्वर बन पाना संभव है अन्यथा यह असम्भव है। 


परमात्मा ने हर एक को नियति प्रदान की है और वह अपनी नियति के अनुसार कार्य करती है। केवल मनुष्य ही है एक ऐसा प्राणी हैं जो इस नियति के परे जा सकती हैं किंतु हमें वहां तक जाने के लिए तीन बाधाओं को पार करना होगा जो निम्न्न हैं। 


सवभाव :- हर मनुष्य की अपनी एक स्वभाव  होती है और वह अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करती है जैसे नदी ,नदी का स्वभाव होता है नीचे की और बहना वह कभी ऊपर की ओर नहीं बहती हैं और नदी अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं कर सकती हैं परन्तु प्रभावित अवश्य होती है। किंतु मनुष्य अपने स्वभाव में परिवर्तन कर सकता है और परिवर्तन करने से ही उसकी नियति बदल जाती है और वह उस मुकाम को छू लेता है जिसका वह कभी कल्पना भी नहीं किया था। यदी वह अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं करता हैं और एक ही स्वभाव को पाले रखता है तो वह एक विशेष मनोदशा में चला जाता है और वह मनोदशा ही उसकी नियति बन जाती है।



 मनोदशा :-  एक ही स्वभाव को पाले रहना और उसमें परिवर्तन ना करने से वह एक विशेष मनोदशा में चला जाता है। जैसे एक बच्चा बचपन से चोरी करता है और जवानी तक आते आते वह चोर बन जाता है वह अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं करता है तो वह चोरी करने की मनोदशा को प्राप्त कर लेता है इसे ही हम मनोदशा कहते हैं। आपकी जैसी मनोदशा होगी वैसा ही आपका भविष्य होगा और जो मनुष्य अपनी मनोदशा से ऊपर उठ जाता है वह नियति के परे को देखता है वह ईश्वर हो जाता है। 



प्रभाव :- हमारे स्वभाव पर जब किसी का प्रभाव पड़ता है और हम उसके अनुसार ही कार्य करते हैं तो उसे प्रभाव कहते हैं अर्थात अपना स्वभाव को त्याग कर दूसरे के स्वभाव को ग्रहण कर लेना ही प्रभाव कहलाता है हर मनुष्य अपने जीवन में प्रभावित होता रहता है।  जैसे पानी का स्वभाव बहना है यदि हम उसे जीरो डिग्री तापमान पर ले जाए तो वह बर्फ बन जाता है। अर्थात् पानी उस वातावरण के स्वभाव को ग्रहण कर लिया है तो उसे अब बर्फ कहा जाएगा पानी नहीं और ठोसपन उसका नियति बन जाता है। 



इस प्रकार देखा जाए तो मनुष्य किसी बुरे प्रभाव में आकर वह बुरा बन जाता है और यह उसकी नियति बन जाती है और जब उसका परिणाम आता है तो वह दूसरे को दोष देता है।यदी कोई दोष ना मिले तो कहता है कि यही मेरा नियति है जिसका निर्माण वह खुद किया है। यदि वह चाहता तो अपनी नियति में परिवर्तन कर सकता था और वह उस परम ऊंचाई को छू सकता था। 



अर्थात हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि नियति पानी की तरह होता है जिसमे मिला दो वो वैसा ही बन जाता है और जो अपने आप को शून्य कर लेता है और प्रकृति के नियति द्वारा कार्य करता है वह सभी बाधाओं से मुक्त होकर इस नियति के चक्रव्यूह से बाहर निकल जाता है क्योंकि स्वभाव से ही नियति की निर्माण होती है।

                                                               जय वासुदेव श्री कृष्ण  

Wednesday, December 5, 2018

December 05, 2018

Wisdom and Knowledge

                                            विद्या और ज्ञान 

विद्याऔर ज्ञान इस दोनों शब्द का अर्थ हमलोग एक ही निकालते हैं। पर वास्तव मैं दोनों मैं भारी अन्तर हैं एक सीमित हैं तो दूसरा असीमीत हैं एक का अनुसरण सारा जग करता हैं तो दुसरा बड़ा अनमोल हैं जो भाग्यशाली को ही मिलता हैं अब प्रशन उठता हैं की कैसे हम समझे की दोनों मैं भारी अन्तर हैं तो आइये इसे समझने का कोशिस करते हैं।

 हमारी नजरो में विद्या और ज्ञान क्या हैं यह में आपको सधारण भाषा मैं समझाने की कोशिस करूँगा। जो मैं अब तक समझ पाया हूँ जहाँ तक मुझे समझ मैं आया हैं।  यह जरुरी नहीं हैं की मैं जो कह रहा हूँ वह सत्य हैं यह आपके बिवेक पर निर्भर करता हैं की आप किसी तथ्य को कैसे देखते हैं।


a/विद्या  :- विद्या हैं क्या जो हम स्कुल से प्राप्त करते हैं। जी हा किन्तु मैं केवल इसी का बात नहीं कर रहा हूँ मैं यहाँ वह तमाम कला की बात कर रहा हूँ  जो हर एक व्यक्ति के पास अपनी जीविका को चलाने के लिए एक कला होती हैं जिसके माध्यम से वह अपना जीवन यापन करता है किन्तु फिर भी वह दुखी और निराश हैं क्यू इसके क्या कारण हैं इसी तरह मेरे मन मैं प्रशन उठते हैं आपके मन में भी उठते होंगे इसे ही जानने का कोशिस करता हूँ मैं यहाँ विद्या को दो श्रेणी में बाटता हू एक विद्या दूसरा कला। 

१/ प्रथम श्रेणी :- यहाँ मैं उस विद्या की बात कर रहा हु जो हम स्कुल से प्राप्त करते हैं किसी संस्था से प्राप्त करते हैं इसे लेकर हम डॉक्टर ,इंजीनियर ,वकील जस्टिस मैनेजर इसी तरह नाना प्रकार के इस विद्या के नाम पड़े हैं  फिर भी खुश नहीं हैं और अपने आपको एक पिंजड़ा में पाते हैं क्यू ?


 इसका उत्तर कुछ इस प्रकार है की मान लीजिये की Z  नाम का व्यक्ति ने कानून का निर्माण किया अब इस कानून को A से लेकर Y तक का मनुष्य इसे ग्रहन कर रहे अर्थात यह सभी Z की भाषा बोल रहे इनका अपना कुछ नहीं हैं जब हम किसी का भाषा बोलते हैं तो हमे तोता कहा जाता हैं जिसने केवल रटना सीखा और रटने के कारण ही यह पिंजड़े में हैं और पिंजड़े का तोता बोल तो सकता हैं पिंजड़े में घुर सकता हैं पर उड़ नहीं सकता यहाँ उड़ सकता हैं तो केवल Z उड़ सकता हैं क्यूकि उसने अपनी भाषा बोला हैं वह इन लोगों के भाति रटा नहीं हैं और Z इतना उड़ रहा हैं की सारी दुनिया इन्ही का भाषा बोल रहा हैं तो भाई Z बनो तभी उड़ सकोगे नहीं तो सारा जीवन पिजड़े में ही रहोगे।

 अब यहाँ प्रशन उठता हैं की कोनसा पिंजड़ा किस पिंजड़े की बात कर रहे हैं तो मैं प्रकृति के पिंजड़े की बात कर रहा हूँ यहाँ जो ओरो की भाषा बोलता हैं वह जीवन और मृत्यु के पिजड़े में कैद रहता हैं क्यूकि प्रकृति ने आपको अपनी भाषा बोलने के लिए भेजा हैं और आप ओरो की भाषा बोल रहे हैं यहाँ जो ओरो की भाषा बोलता हैं वह प्रकृति के पिंजड़े से कभी नहीं छूटता हैं। और ना ही प्रकृति इनका साथ देती हैं।


२/ द्वितीय श्रेणी:-इस श्रेणी में कला आती हैं जिसे हम अपनी परम्परा से प्राप्त करते हैं जैसे एक रिंग मास्टर शेर को उछलना -कूदना सिखाती हैं वैसे ही हमारे बाप -दादा और गुरु यह कला सिखाती हैं की सीख ले बेटा जीवन में काम आएगा और हम सीखते हैं इसलिए सीखते है की ताकि मेरा जीवन सुखी रहे पर क्या हम वास्तव में सुखी होते मुझे तो नहीं लगता की हम सुखी होते हैं थोड़ा सोचे की एक क्या रिंग मास्टर के अधीन रहकर सुखी रह सकता हैं कभी नहीं तो फिर हम जंगल की और चले तभी हम सुखी रह सकते हैं क्यू शेर होकर भी हम पिंजड़े में हैं जब तक हम इस पिंजड़े में हैं तब तक हमे वह जंगल का आनंद नहीं मिल सकता हैं। जंगल अर्थात प्रकृति का आनंद और मुझे प्रकृति का आनंद तभी मिलेगा जब हम अपनी भाषा बोलेगे जब तक हम ओरो की भाषा बोलेंगे तब तक हम पिजड़े में ही रहेंगे।


b/ज्ञान :-   ज्ञान क्या हैं और यह क्या सभी के पास है जी हा यह सभी के पास हैं किन्तु हम उस ज्ञान का प्रयोग नहीं करते जो हमारे भीतर हैं इसके प्रयोग ना करने के कई कारण हैं जैसे लाभ -हानि ,तेरा -मेरा ,उच्च -नीच ,मोह ,इस्या इत्त्यादि। इन सभी कारणों से हम अपने ज्ञान का प्रयोग नहीं कर पाते और बिना कुछ किये हम यहाँ से चले जाते हैं जिसके कारण हमारा सारा जीवन व्यर्थ हो जाता हैं।


परमात्मा ने प्रत्येक मनुष्य को एक अद्धभुत ज्ञान प्राप्त किया हैं। इस दुनिया में ऐसा एक भी मनुष्य नहीं जिसके पास एक विशेष ज्ञान ना हो सभी मनुष्य के पास एक अवश्य होता यदि हम उसे पहचान ले तो सारी दुनिया को अपनी जेब में लेकर घूरेंगे किन्तु हम ऐसा कर नहीं पाते कारण अपने ज्ञान को ना पहचान पाना।


अब इस ज्ञान को पहचाने के लिए या उसे अमल में लाने के लिए हमे किसी गुरु या स्कुल में नहीं जाना यह तो हमारे भीतर है जैसे जब कोई जानवर या फिर मान लीजिये एक कुत्ता जब यह अपने बच्चे को जन्म देता हैं तो वह अपने बच्चे को क्या सिखाता हैं कुछ भी नहीं किन्तु जीवन में जिस भी समय जिस ज्ञान की आवश्कता होती वह उस समय प्रकट हो जाता जैसे आप किसी कुत्ते को तालाब में फेंक दीजिये तो आप देखंगे की वह तैर कर बड़े आराम से बहार निकल जाता हैं तो यह प्रशन उठता हैं की यह तैरना उसे किसने सिखाया किसी ने नहीं तो यह ही ज्ञान हैं जो अपने -आप निकलती हैं और हम मनुष्य बचपन से अभी तक सिखने में लगे हैं। किन्तु अब तक सीख नहीं पाए तो आईये जानते हैं की हम अबतक क्यू नहीं सिख पाए।


१/ माता -पिता : प्रत्येक माता -पिता अपने संतान को बड़ा लाड़ -प्यार से पालता हैं उसके हर जरुरत को पूरा करता है किन्तु उसे उस ऊचाई तक नहीं पहुँचा पाता हैं जिस उचाई पर पहुँचने के लिए उसे परमात्मा ने भेजा हैं ऐसा क्यू क्यूकि परमात्मा ने उसे जो ज्ञान दिया हैं उस ज्ञान का प्रयोग कर नहीं पाता हैं। यहाँ पर माता के कुछ अलग सपने हैं जिसे वह अपने समय में पुरा कर नहीं पाता तो इसे वह अपने संतान के द्वारा पुरा होता देखना चाहता दूसरी तरफ पिता के भी कुछ सपने हैं वह भी अपने सपने को संतान के द्वारा पुरा होते देखना चाहता हैं और संतान कुछ ओर करना चाहता हैं पर संतान ऐसा कुछ कर नहीं सकता क्यूकि वह नदान अज्ञानी हर संतान अपने माता -पिता के लिए नदान और अज्ञानी ही होता हैं तो संतान की कुछ चलने वाली हैं नहीं रही बात माता -पिता की तो उसमे जिसका पलड़ा भारी होगा संतान उसका ही सपना पुरा करेगा इस तरह संतान के पास जो प्रतिभा थी वह भीतर ही दब गई उसे जो परमात्मा ने जो ज्ञान देकर भेजा था वह उसे वापस लेकर जायेगा।


२/ परिवार :-  इनकी तो बात ही मत करिए ये तो आलू -प्याज के भाव ज्ञान बेचते हैं सम्पूर्ण जगत में यहीं तो एक ज्ञानी हैं ये कर लो ,व कर लो ,इसे करने ऐसा होता हैं वैसा होता हैं और ना क्या -क्या कहकर उस बच्चे कहाँ ढकेल देते जहाँ से वह कभी निकल ही ना पाय यदि आप ना मने तो उधारण भी देंगे की फला ने ऐसा किया तो ऐसा हुआ आप भी कर लो तो भला हो जायेगा इतना भला होता हैं की सारा जीवन चिंता में ही गुजर जाती हैं।


३ /स्कुल ,कॉलेज और विश्वविद्यालय  :-  यहाँ पर दो प्रकार के बच्चे आते है और दोनों एक साथ पढ़ते हैं जिसमे एक का जीवन आबाद होता है हैं तो दूसरा का बरबाद  तो आइए जानते हैं की एक आबाद तो दूसरा बरबाद


प्रथम बच्चा :- यह वह बच्चा हैं जो इसी के लिए बना हैं इनके अन्दर  एकाग्रता कूट -कूट कर भरी होती है जिसके कारण यह हमेशा अव्वल आता हैं और अपने जीवन में कुछ ऐसा कर देता हैं जिससे सारा जग़त को लाभ होता है तो क्या यह ज्ञान इसे स्कुल ,कॉलेज और विस्वविदायलय ने दिया नहीं यह तो इसके भीतर ही था बस इन्होने इसे सवारा हैं।

 द्वितीय बच्चा :- यह वह बच्चे हैं जिसे कुछ ओर बनना था और यह कुछ ओर बनने चले आए इनके साथ एक तरह से जबरदस्ती हो गई जिसके कारण यह पढ़ाई ऐसे करते हैं जिसका हमारे समाज में कोई मोल नहीं हैं अब यह जाय तो कहाँ जाय बस ठोकर खाते फिरता हैं यह तो पढ़ाई ऐसे की की ना ऑफीसर बन पाया और ना ही मजदुर।

c/कोण हैं ज्ञानी :- ज्ञानि वह हैं जो तोतो की भाषा नहीं बोलता वह अपनी भाषा बोलता हैं और जो अपनी भाषा बोलता है वह कोयल के भांति होता हैं जिसे कोई पिंजड़ा में कैद नहीं करता हैं। विद्या तो हम मनुष्य से प्राप्त करते हैं जो यहाँ आकर सीखता हैं परन्तु ज्ञान जन्म से ही प्राप्त होता हैं किन्तु मनुष्य उसपर धयान नहीं देता और विद्या प्राप्त करने में मनुस्यो में होड़ लगी रहती है जिससे केवल भौतिक सुख प्राप्त होता हैं जिसे पूर्ण रूप से पाकर भी दुःखी होता हैं और शांति को ढूंडता पर उसे शान्ति प्राप्त नहीं होता हैं क्यूकि मनुष्य ने विद्या को अधिक महत्तव दिया हैं और ईस्वर के द्वारा दिया ज्ञान पर कभी विचार नहीं किया हैं। जिसके कारण वह दब गया हैं हम भली -भाती जानते हैं की विद्या का जन्म ज्ञान से हुआ हैं जैसे आपकी इच्छा शक्ति प्रबल ना हो तो आप किसी विद्या को प्राप्त नहीं कर सकते हैं।


ज्ञान की मात्रा जिस व्यक्ति में जितना होता हैं उसके अनुपात के हिसाब से ही विद्या प्राप्त करता हैं यहाँ वह विद्या  तो प्राप्त कर लेता है और ज्ञान को भूल जाता हैं जिससे ज्ञान का ना बहने से वह अधिक ऊंचाई पर नहीं चढ़ पता हैं अर्थात जन्म के समय उसे जो ज्ञान ईस्वर से प्राप्त होता उसे वह बढ़ाता नहीं हैं उसी मात्रा में छोड़ देता हैं और संसार के भौतिक सुख के प्रति लालशा को बढ़ाबा देता हैं और उसे प्राप्त करके भी दुःखी होता हैं यदि ना हो तो भी दुःखी होता हैं वास्तव में दुःख का कारण ज्ञान का ना होना हैं यदि मनुष्य के पास ज्ञान प्रथम स्थान पर हो और विद्या दूसरे स्थान पर हो तो मनुष्य को दुःख होगा ही नहीं।


ज्ञान को आज की दुनिया में कोई भी महत्तव नहीं देता हैं परन्तु आज जो कुछ भी निर्मित होता हैं वह ज्ञान से ही होता है ऐसे कितने  वैज्ञानिक है जिसने स्कुल ,कॉलेज और विश्वविद्यालय ना के बराबर गये हैं उनमे से एक हैं थामस ऐल्वा एडिसन।यह सभी जानते हैं और सभी को पता हैं जिसने बल्ब का अविष्कार किया जिससे आज सारा जगत रोशन हैं। ऐसे हम भली - भाति जानते हैं की विज्ञान का जन्म ज्ञान से ही होता है जो कुछ गिने चुने लोगो को ही प्राप्त होता हैं और जिसे प्राप्त हुआ है वह अमर हो गया है जैसे श्री राम चन्द्र ,वासुदेव श्री कृष्ण ,गौतम बुध ,वेद व्यास ,तुलसी दास ,कबीर दास ,रहीम दास इत्त्यादि। इन सभी को ज्ञान प्राप्त हैं और आज हम जो कुछ भी पा रहे हैं वह सब इन्ही का देन हैं आज जो हमलोग प्रगति किये हैं वह सब इन्ही का देन हैं। क्यूकि इन्ही लोगो ने जीवन का सही मतलब समझाने में सफल हुआ है।
                                                           जय वासुदेव श्री कृष्ण 

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मेरा ईस्वर मैं स्वंय हूँ इसलिए मुझे यह दुनिया कुछ अलग ही दिखाई देती हैं। यदि आप भी मेरी तरह इस दुनिया को देखना चाह्ते हैं तो मेरे साथ दो क़दम चलिए तो आपको इस दुनिया की कुछ अलग ही तस्वीर दिखाई देंगी

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