शुभं करोति कल्याणं कलनग्यं धनसम्पदा। शत्रु बुद्धिनविनाशाय दीपज्योतिरनस्तुते ।।

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Sunday, July 21, 2019

July 21, 2019

Sex energy and its leela

                         सेक्स ऊर्जा और उसकी लीला


सेक्स ऊर्जा मनुष्य की सभी ऊर्जा में से एक  महा ऊर्जा है जो मनुष्य की जीवन की सारी लीलाएं इसी ऊर्जा पर निर्भर करती है।  मनुष्य जो कुछ भी सोचता है या बोलता है या फिर करता है या उनकी सभी क्रिएटिविटी  इन्हीं ऊर्जा से संचालित होती है।

कहने को तो यह सेक्स उर्जा है किंतु जब आप इसका मंथन कीजिएगा तो आप पाएंगे कि यही वह ऊर्जा है जो पूरी ब्रह्मांड को नियमित रूप से संचालित करती रहती है यह ऊर्जा इस पृथ्वी के हर एक कण में हर एक जीव जंतु में पाया जाता है।

इस ऊर्जा की परवाह दो तरफ होती है एक भीतर की ओर दूसरी बाहर की ओर भीतर की ओर ऊर्जा हमें क्रिएटिविटी करने को प्रेरित करती है और जो ऊर्जा बाहर की ओर परवाह  होती है हुआ वह हमारे जीवन की तमाम क्रियाकलापों को निर्धारित करती है अर्थात हम जो कुछ भी करते हैं या जो कुछ करने वाले होते हैं हमें यही भीतर से बाहर की ओर धक्का देती है।

इनकी  क्रियाओं को या इनकी  लीलाओं को संक्षिप्त रुप  से जाने की
कोशिश करते हैं इन्हें समझने के लिए हम इस ऊर्जा को दो भागों में बांटते हैं एक बाहर की ओर परवाह दूसरी भीतर की ओर परवाह

1 बाहर की और प्रवाह >  यह ऊर्जा मनुष्य की जीवन और मृत्यु और उनकी समस्त लीलाओं को निर्धारित करती है जब यह  बाहर की ओर परवाह होती है तो मनुष्य अपने जीवन की आम क्रियाओं को करते हैं उनमें कोई विशेष बात या विशेष क्रिएटिविटी नहीं होती है वह बस कमाना,खाना, पीना, घुरना , तेरा-मेरा, अपना-पराया, पाप -पुणे इन सभी कार्यों में उलझा रहता है।

अर्थात वह  एक साधारण मनुष्य के भांति जीवन को जीता है जिसका जीवन का कोई विशेष मकसद नहीं होता है। वह यूंही राही की तरह राह पर चलता ही रहता है। उसकी मंजिल कहां है उसे कहां तक जाना है यह सब बातों से अनजान रहता है।

हमारे जीवन की सारी खेल इन्हीं ऊर्जा  से प्रभावित होती रहती है।  इन ऊर्जा को पचा पाना बड़ा ही मुश्किल कार्य है। इन ऊर्जा को जिसने पचाया वह महामानव बन गया अर्थात अपनी उर्जा को सही दिशा देने की कला जिसमें आ गई वह परमात्मा हो गया अब ना उसमे  और ना ही परमात्मा में कोई अंतर है

क्योंकि यह  बड़ा ही  भयानक और विकराल होता है अर्थात इसका तेज सुर्य  से भी अधिक तेज होता  है जिस कारण हम इस तेज  को नहीं संभाल पाते हैं और इसे निकालने के कई बहाने ढूंढते हैं

जैसे ईर्ष्या , क्रोध, प्रेम, नफरत इन सभी भावनाओं से ओतप्रोत होते रहते हैं।  क्योंकि  यह ऊर्जा हमारे नियंत्रण में नहीं होती और यह हमसे जो कुछ भी करवाना चाहती है वह बड़ा सरलता पूर्वक करवा लेती है अन्यथा हमारे जीवन में हमें क्या पाना है क्या खोना है ना कुछ पाना है ना कुछ खोना है फिर भी जीवन में हजारों झंझट पाल कर रखे हुए हैं।

2 भीतर की ओर परवाह>  सेक्स ऊर्जा की परवाह यदि भीतर की ओर हो  रहा है तो फिर वह मनुष्य कोई आम मनुष्य नहीं है। उस मनुष्य का जीवन इस कदर चमक उठता है जैसे आकाश में सितारे चमकते रहते हैं उसी तरह वह मनुष्य जीवन रूपी ब्रहमांड में हमेशा चमकता ही रहता है।

यह मनुष्य हजारों में एक ,लाखों में एक ,करोड़ों में एक ही होते हैं यह वह मनुष्य है जिसने अपनी उस महान तेज को सही दिशा देने में सफल हो गया है।

इसमें कुछ अध्यात्मिक गुरु जी हैं ,कुछ अध्यात्मिक महापुरुष हैं ,कुछ वैज्ञानिक हैं ,कुछ लेखक हैं ,कुछ समाज सुधारक भी हैं। इन सभी की वजह से तो हमारा जीवन आज रंगीन है यदि यह लोग ना होते  तो हमारे जीवन के मुख मंडल पर  हमेशा उदासी की बादल छाया ही रहता।

 यह वही मनुष्य है जिसने अपनी उर्जा को अपने नियंत्रण में किया है। और अपने नियंत्रण में करने के कारण ही यह मनुष्य आज इस जीवन रूपी ब्रह्मांड में सितारों की भांति चमकता हुआ प्रतीत होता है जिसे हर एक बिछड़ा हुआ व्यक्ति उसके जैसा बनने की चेष्टा करता है।

किंतु यह तभी मुमकिन है जब हम अपनी सेक्स ऊर्जा को भीतर की ओर प्रभाव करना सीख जाए या फिर यूं कह लें कि हम अपनी ऊर्जा को सही दिशा देना सीख जाए।

अर्थात अपने तेज को उस कार्य में लगाएं जिस कार्य से इस संपूर्ण ब्रहमांड का हित हो ना कि अहित हो ब्रह्मांड का हित में ही हमारा हित है। यह परिभाषा तो  महामानव सरलता पूर्वक समझ सकते हैं।

किंतु आम मनुष्य के लिए या ज्ञान केवल एक रास्ते पर पड़े पत्थर के टुकड़ों के समान है जिसे व अपने पैरों से ठोकर मारते रहते हैं। जिसके कारण वह भी अपने जीवन की भवसागर में ठोकर खाते रहते हैं फिर भी उसे यह समझ में नहीं आता कि जीवन है क्या।

मैं इस ऊर्जा के बारे में बस दो शब्द आपको बताने की कोशिश की है इस ऊर्जा की व्याख्या करने में तो हमारा हजारों जीवन भी कम पड़ जाए।
                                                  जय वासुदेव श्री कृष्ण 

Sunday, January 20, 2019

January 20, 2019

Effects of Natural Love [Part-2]

                 प्राकृतिक प्रेम का प्रभाव [भाग -२  ]


आज जिस युग में हम लोग जी रहे हैं उस युग के बच्चे 12 वर्ष की उम्र में जवान  हो जाते हैं। 12 से 25 वर्ष तक के उम्र में बच्चे या तो बहुत गंभीर होते हैं या फिर बहुत चंचल होते हैं।  यह हमारे जीवन का वह समय है जहां हमारा जीवन बनता और बिगड़ता है। यदि इस समय कुदरती प्रेम दस्तक दे दे तो फिर अपने जीवन को सही दिशा दे पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है क्योंकि यह वह समय है जब हम अपने जीवन को संवारने में लगे रहते हैं और यदि किसी से प्रेम हो जाए तो हमारा सारा ध्यान उस और चला जाता है जिसके कारण हम अपने जीवन में कुछ करने से चूक  जाते हैं अंत में वह हाल होता है कि हम ना ऑफिसर के काबिल रहते हैं और ना ही मजदूरी करने के लायक।  रही बात प्रेम की तो वह सावन के झूलों की तरह होता है जो एक निश्चित समय के लिए आता है और फिर चला जाता है पर इसका छाप हमारे पूरे जीवन पर पड़ता है।



प्रभाव:- जब जवानी में हमें किसी से प्रेम हो जाए तो यह हमारे ऊपर दो तरफा वार करता है। एक वह जिसे हम अपने दिल से लगा लेते हैं जिसके आगे दुनिया की हर चीज़ फीकी हो जाती है। और हम यही सोचते हैं कि मेरा सारा जीवन यूं ही चलता रहेगा पर ऐसा होता नहीं है दूसरी ओर हमारा सेक्स हमारे ऊपर इस कदर हावी होता है कि भूतनी भी हमें परी दिखाई देती हैं वह सेक्सी ही हैं जो हमें रंग बिरंगा सपना दिखाता है वास्तविक दुनिया से निकल  कर हम कल्पना के दुनिया में चले जाते हैं।


इस समय हमारा जीवन का दशा-दिशा कुछ और होता है। हम बड़े उमंग और उत्साह में होते हैं और यदि प्रेम मिल जाए तो हमारा उमंग और उत्साह सातवां आसमान पर पहुंच जाती है। जिसे हमारे जीवन को संवारने या कामयाबी की बुलंदी को छूने में लगाना चाहिए था। हम उस उमंग उत्साह को प्रेम में लगा देते हैं जिससे हमारे जीवन की महत्वपूर्ण समय प्रेम के चक्कर में हमारे हाथों से निकल जाती है


जवानी की उबाल के कारण हमारे ऊपर प्रेम बुरी तरह हावी रहता है जिसके आगे हमें ना कुछ दिखाई देती है ना कुछ समझ में आता है। लगता है कि सारा जीवन यूं ही रोशन रहेगा किंतु ऐसा होता ही नहीं है क्योंकि परिवर्तन ही संसार का नियम है हर एक वस्तु अपने निश्चित समय के उपरांत परिवर्तित हो जाती हैं। उसी तरह हमारी भावना भी एक निश्चित समय के अंतराल पर परिवर्तित हो जाती हैं किंतु यह प्रेम हमारे शरीर पर ना वार करके हमारी भावनाओं पर वार करता है जिसका छाप पूरे जीवन पर पड़ता है। जब भी हम कहीं में एकांत बैठते हैं तो हमें वह प्रेम की दो पल याद आते हैं और हम यही सोचते हैं कि काश वैसा ही हमारा सारा जीवन होता है। किंतु ऐसा होता नहीं फिर भी हम क्यों उस आग में अपने जीवन की अनमोल समय को झोंक  देते हैं। जिसके बदले में हमें कुछ प्राप्त नहीं होता और अंत में ठोकरें खाते फिरते हैं। इससे भला होता कि हम प्रेम ना करते हैं किंतु हम करें भी तो क्या कर सकते हैं कुदरती प्रेमी को कोई नकार नहीं सकता यह सत्य है जो हर मनुष्य के जीवन में एक बार आताअवश्य है।



दुष्प्रभाव:- इसका दुष्प्रभाव यह होता है कि अंत में हमारे पास ना प्रेम होता है। और ना ही हम कुछ करने के लायक बचते  हैं क्योंकि जो उमंग उत्साह हमारे जीवन को संवारने में लगाना चाहिए था। वह उमंग उत्साह प्रेम में लगा दिए और अंत में प्रेम भी हमें छोड़ कर चला जाता है। जिसका दुष्प्रभाव हमें सारा जीवन भर झेलना  पड़ता है अर्थात हमने प्रेम के चक्कर में आकर पढ़ाई लिखाई कुछ इस तरह की कि हम ना ऑफिसर बन पाए और ना ही मजदूर बन पाए हैं वाह रे प्रेम बस अब नमक रोटी की तलाश में ठोकर खाते से फिरते  हैं कि दो वक्त की रोटी मिल जाए, तन ढकने का वस्त्र मिल जाए, सर ढकने का छत मिल जाए किंतु यह सब चीज इतनी आसानी से नहीं मिलती है यह सब चीज को पाने के लिए एक लंबे समय तक परिश्रम करना पड़ता है और जब हमें परिश्रम  करने का मौका मिला तब हम रंगरेलियां कर रहे थे ऐसी रंगरेलियां की कि हमें आज ठोकर खाना पड़ रहा है। वाह रे प्रेम अद्भुत है तेरी माया।



हमें क्या करना चाहिए:- कुदरती प्रेम जब हमारे जीवन में आती है तो यह बड़ा गहरा प्रभाव डालती है हम ना चाहते हुए भी इस के चक्कर में फस जाते हैं क्योंकि यह सीधा हमारे मनोदशा को प्रभावित करती है जिसके कारण हम आकर्षित हो जाते हैं। और अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय गंवा बैठते हैं तो हमें क्या करना चाहिए कि यह हम पर अपना प्रभाव डाले और जिससे हमारा महत्वपूर्ण समय बर्बाद ना हो तो हमें दोनों में तालमेल बिठा कर आगे बढ़ना चाहिए जिससे हम प्रेम का भरपूर आनंद ले सके और अपने कैरियर को भी कामयाबी की ऊंचाई तक पहुंचा पाए। क्योंकि हम या भली-भांति जानते हैं कि प्रेम सदा हमारे जीवन में नहीं रहेगा यह आज है तो कल चला जाएगा इस बात की गांठ बांधकर हमें सावधान हो जाना चाहिए


यदि हम कुदरती प्रेम से भागते हैं या अपना दामन छोडाते हैं तो यह संभव नहीं है क्योंकि या कुदरत के द्वारा तय किया हुआ चक्रव्यूह है जिसे भेदने  का हमारे पास कोई तरीका नहीं है यदि हम इससे पीछे की ओर भागे हैं तो यह हमारे ऊपर और अधिक तेजी से वार करेगा और जब यह तेजी से वार करेगा तो जो बर्बाद होने में 2 साल लगती है वह 2 दिन में ही हो जाएगा इसलिए प्रेम का आनंद भी ले और अपना कैरियर को भी साथ साथ लेकर चले जिससे हमें आगे जाकर ठोकर ना खाना पड़े
                                                           अब अधेड़ की प्रेम कहानी हम आगे सुनायेंगे 
                                                                        जय वासुदेव श्री कृष्ण

Sunday, January 6, 2019

January 06, 2019

Effects of Natural Love [Part-1]


                  प्राकृतिक प्रेम का प्रभाव [भाग -१ ]


प्रेम  एक अनुभव का नाम है जो प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता है।  जो हर किसी के जीवन में आता जाता रहता है। यदि हम इसके प्रकार को देखें तो यह मुख्य दो प्रकार की होती हैं।  एक कुदरती प्रेम और दूसरा स्वार्थी प्रेम कुदरती प्रेम को कुदरत तय करता है कि आपको प्रेम किससे होगी कब होगी कैसे होगी दूसरी और स्वार्थी प्रेम को मनुष्य अपने स्वार्थ  के मुताबिक किसी से प्रेम करता है।



कुदरती  प्रेम मनुष्य के जीवन में कभी किसी भी स्थिति में आ सकती हैं। हमें यह जानना जरूरी है कि हमारे जीवन में यह क्या प्रभाव डालती हैं इसका क्या दुष्प्रभाव होता है। जब हमारे जीवन में यह होती है तो हमें उस वक्त क्या करना चाहिए जिससे हमारा नुकसान भी ना हो और हम प्रेम का भरपूर आनंद ले सकें इसके परिणाम को जानने के लिए मनुष्य जीवन जीवन को चार चरणों में विभाजित करके देखते हैं।



१ / बचपना :-कुदरती प्रेम जरूरी नहीं कि वह आपके जवानी मैं हो यह आपके बचपन के जीवन में भी दस्तक दे देती है। और जब या हमारे बचपन के जीवन में आ जाए तो इसका क्या प्रभाव होगा क्या दुष्प्रभाव होगा उस समय हमें क्या करना सही है। आइए जानने की कोशिश करते हैं।



प्रभाव :- बचपन का जीवन एक निर्दोष पूर्ण जीवन होता है।  इस समय हमारा दिमाग बिल्कुल खाली होता है।  इस समय यदि कुदरती प्रेम हो जाए तो फिर इसका प्रभाव हमारे सारे जीवन पर पड़ता है।  क्योंकि कुदरती प्रेम बहुत ही प्रभावशाली होता है। जो हमारे जीवन की दशा और दिशा बदल देते हैं जैसे मीराबाई इनको बचपन में ही प्रेम हुआ था जिससे इनका जीवन का दशा और दिशा पूरा ही बदल गया यह बात हम आप क्या सारा संसार जानता है।  जिसे हमारा समाज ने एक अलौकिक प्रेम का नाम दिया है। ऐसे तो कुदरती प्रेम एक अलौकिक प्रेम ही होता है जो जीवन के किसी भी पड़ाव में हो सकता है यह जीवन की उमर को नहीं देखती है।



दुष्प्रभाव:- जब इस प्रकार का प्रेम हमारे जीवन में होता है तो हम मनुष्य जीवन की मुख्यधारा से कट जाते हैं। और मुख्यधारा से कटने के कारण हमारे ऊपर के प्रकार के लांछन लगना शुरू हो जाता है।  समाज की ओर से हमें प्रताड़ित किए जाने लगता है।  फिर भी हम इस प्रेम के प्रभाव में रहने के कारण हमारे ऊपर न  लांछन का  प्रभाव पड़ता है।  और ना ही हमें प्रताड़ित होने का भय होता है।



हमें क्या करना चाहिए:-  जब कुदरती प्रेम हमारे जीवन में आ जाए तो हमें जीवन को संतुलित करके आगे बढ़ना चाहिए।  ताकि हम प्रेम का भरपूर आनंद ले सकें और मुख्यधारा से भी ना कटे।  यदि आप सोचते हैं कि मैं प्रेम ही ना करूं तो ऐसा हो नहीं सकता है।  क्योंकि कुदरत के प्रभाव को काटने की सत्ता आपके पास है ही नहीं।  यह कुदरत पर निर्भर करता है कि यह  प्रेम आपके जीवन में कब तक रहेगा।  यह किसी के जीवन में जीवन भर या कुछ समय तक या कुछ पल के लिए ही रहता है। किंतु मैं आपको यह भी बताना चाहूंगा कि कुदरती प्रेम में मिलन नहीं होता है। आप कोई भी प्रेम ग्रंथ उठा कर देख सकते हैं और मिलन ना होने के कारण यह अत्यंत प्रभावशाली होता है। जिसके कारण आकर्षण का प्रभाव बना रहता है।


                                                                   जय वासुदेव श्री कृष्ण

Sunday, December 23, 2018

December 23, 2018

Merit of success


                                           सफलता के गुण



इस जगत में हर कोई सफल होना चाहता है पर उसमें किसी को सफलता मिलती है। तो कोई असफल हो जाता है जो सफल है वह तो ठीक है उसका उद्धार हो गया पर जो असफल है उसका क्या उसे कैसे सफलता मिलेगी उसने कहाँ चुक की जो असफल हो गया हैं। जीतने भी सफल व्यक्ति हैं उसमें विशेष पाँच गुण पाए जाते हैं और वह उसे उसी पाँच गुण के बदौलत सफल हुए हैं। अर्थात हमें भी सफल होने के लिए उस पांच गुणों को धारण करना होगा तभी हम सफल हो पाएंगे तो वह पाँच गुण क्या है।  तो वह पाँच गुण धर्म, समर्पण, धैर्य, प्रेम और न्याय है। यदि इसे हम ग्रहण कर ले तो हमारी सफलता निश्चित है किंतु धारण करने से पूर्व हमें अर्थ जानना अनिवार्य है।  यदि हम उसका अर्थ नहीं समझेंगे तो उस गुण या शक्ति का प्रयोग सही रूप में नहीं कर पाएंगे तो इसका अर्थ समझने का प्रयास करते हैं



धर्म:- धर्म शब्द जब हमारे सामने आता है तो हम किसी विशेष समुदाय की ओर इशारा करते हैं जैसे हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई इत्यादि  तो क्या इसे हम अपना धर्म मान ले या फिर विचार करें कि मेरा धर्म क्या है।  धर्म का वास्तविक अर्थ होता है कि हम जो कार्य कर रहे हैं वह कहां तक उचित है और कहां तक अनुचित है इसे ही धर्म कहते हैं किंतु हम कैसे जाने कि  क्या उचित है या अनुचित है हमें कौन बताएगा तो जनाब आपका धर्म का निर्णय करने वाला आपके भीतर बैठा हुआ है जब आप कोई कार्य करते हैं तो यदि वह कार्य गलत हो तो आप के अंदर से यह इच्छा प्रकट होती है कि नहीं यह कार्य सही नहीं है अर्थात आपका धर्म आपको निर्णय दे दिया है फिर भी आप किसी से प्रभावित होकर या स्वार्थबस होकर कार्य करते हैं जिसको आपका धर्म इंकार कर चुका है फिर भी आप करते हैं और असफ़ल होते हैं।  यदि आप अपने धर्मों को समझ लेते हैं तो सफलता निश्चित ही मिलती और असफ़लता मनुष्य को तभी मिलती है जब वह अपने धर्म के विपरीत कार्य करता है।



समर्पण:- समर्पण वह भाव है जो व्यक्ति को सफलता दिलाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आप जिस कार्य में सफल होना चाहते हैं उसके प्रति आप समर्पित नहीं है तो सफलता की आशा आप कैसे रख सकते हैं। आप जिस कार्य में अपने आप को जितना समर्पित करेंगे उतना हीआपको सफलता मिलेगी समर्पित करने से पूर्व यह विचार कर ले कि आप जिस कार्य के प्रति समर्पित हो रहे हैं क्या वह मेरा ही धर्म है या फ़िर दुसरे से प्रभावित होकर समर्पित हो रहे हैं तो यदि वह आपका धर्म है तो निश्चित ही सफलता मिलेगी वह भी बिना सहायता की अगर वह आपका धर्म नहीं है और आप औरों से प्रभावित होकर  समर्पित हो रहे हैं तो आप सफल नहीं हो पाएंगे क्योंकि आपके मन में नौ -छो लगी रहेगी तो फिर आप सफल कैसे हो पाएंगे जब आपका विश्वास ही डगमगा रहा हो  इसलिए सफल होने के लिए अपनी धर्म की सुने तभी आप पूर्ण समर्पण कर पाएंगे।



प्रेम :- प्रेम का मतलब तो आप जानते होंगे और यह सब के पास है किसी के पास ज्यादा तो किसी के पास कम है।  किंतु प्रेम करना एक अलग बात है और प्रेमपूर्ण होना एक अलग ही बात है। जो प्रेम करते हैं उसे अंत में निराशा हाथ लगती हैं क्योंकि उसने प्रेम नहीं किया है लगाव रखा है और ऐसे लगाव रखा कि यदि वह हाथ से निकल जाए तो मानो उसके ऊपर कोई पहाड़ टूट जाता है। और जब पहाड़ टूटता है तो फिर वह और किसी से प्रेम नहीं कर पाता है निराशा उसे ऐसे जकड़ लेती हैं कि द्वारा प्रेम उत्पन्न होने नहीं देता जिससे उसे असफलता हाथ लगती है।


और प्रेमपूर्ण होना सफलता का राज है जो व्यक्ति प्रेमपूर्ण होते हैं उसे किसी प्रकार हताशा निराशा नहीं पकड़ता और समय के साथ वह भी परिवर्तित हो जाता है। और जो समय के साथ परिवर्तित होता है तो उसे सफलता मिलना स्वाभाविक है।  इसलिए हमें हमेशा समय के साथ चलना चाहिए समय यदी हमसे आगे निकल जाए तो भी हम असफल कहलाते हैं या पीछे छूट जाए तो भी हम असफल कहलाते हैं। इसलिए समय के साथ-साथ चलें और समय के साथ-साथ प्रेमी नहीं प्रेमपूर्ण ही चल सकते हैं। जो प्रेमपूर्ण नहीं है वह समय के साथ नहीं चल सकता यदि हम समय के साथ चलते हैं और समय हमारा साथ चले तो फिर कौन हमें सफल होने से रोक सकता है।



धैर्य :- आज जिस युग में हम चल रहे हैं जहां नींद में भी इंसान तोड़ता है। इतनी जल्दी लगी हुई है कि 12 घंटे की रात को वह चाहता है कि 1 घंटे में सुबह हो जाए जो संभव ही नहीं है। तो बिना धैर्य का सफल होना कैसे संभव है यह प्रकृति अपने नियम अनुसार चलती है तो रात से सुबह होने में जो समय लगता है उस समय आप अपने अंदर धैर्य का धारण करें धैर्य के अलावा यदि आप इधर उधर हाथ पैर मारेंगे तो केवल आपको परेशानी ही मिलेगी सफलता नहीं।


उसी प्रकार जब हम किसी कार्य के लिए मेहनत करते हैं तो हम सफल होना शुरू से ही चाहते हैं। जिसके कारण विफल हो जाते हैं यदि हम कार्य करते जाएं और सुबह होने तक धैर्य रखें तो सफलता अवश्य मिलेगी। पर मनुष्य अपने कार्य  से ज्यादा अपने कार्य के परिणाम पर ध्यान देता है। जिससे वह जीस परिणाम का आशा करता है वह उसे मिलता नहीं है कारण उसका ध्यान परिणाम पर था कार्य पर नहीं यदि वह धैर्य को धारण करता तो उसका ध्यान कार्य पर होता अपने कार्य के परिणाम पर नहीं और फ़िर अपने कार्य के परिणाम के रूप में सूर्य उदय को देखता।



न्याय :- सफल होने के लिए न्यायवान होना जरूरी है अब न्याय किसके साथ किया जाए तो अपने साथ यदि आप  अपना न्याय करने में सफल हो गए हैं।  तो आप सभी का न्याय कर पाएंगे क्योंकि दूसरों का न्याय करना बड़ा आसान है दूसरों की भावनाओं को हम समझ नहीं पाते हैं इसलिए बड़ी आसानी से उसका न्याय कर देते हैं वह जो  महसूस कर रहा है यह जरूरी नहीं कि हम भी वही महसूस करें ऐसा संभव नहीं है क्योंकि सब की भावना अलग अलग होती है इसलिए पहले अपनी भावनाओं को समझें तभी आप दूसरों की भावना समझ पाएंगे यहां हर व्यक्ति अपने साथ अन्याय करके बैठा हुआ है जिसके कारण उसे असफलता  मिलती रहती है।  यदि वह अपने साथ न्याय किया होता तो आज वह असफल नहीं होता।  आज के दौर में मनुष्य अपने से ज्यादा दूसरों की गलतियों को गिनने में लगा है और जब अपनी बारी आती है तो सारी हवा निकल जाती है जिसके कारण वह अपने साथ ही अन्याय कर बैठता  है जो उसे एक कदम पीछे धकेल देता है।


जैसे मान लीजिए कि  x को  सोने की इच्छा और y  को जागने की इच्छा है तो x अपनी विरुद्ध होकर y  के साथ बैठ गया और x  को नींद आ रही है तो वह ना y  के साथ बैठ पा रहा है और ना ही सो पा रहा है अर्थात वह अपना नींद तो खराब किया ही और y  का जागना भी खराब कर दिया था वह दोनों जगह विफल हो गया यदि वह अपने साथ न्याय करके  सोया हुआ होता तो ना वह विफल होता और ना ही y विफल होता।

                                                      जय वासुदेव श्री कृष्ण

Saturday, December 8, 2018

December 08, 2018

What is destiny?

                                                नियति है क्या 

जब किसी के साथ कोई घटना घटती हैं तो वह कहता हैं की यही मेरा नियति है हम क्या कर सकते हैं यह परमात्मा के मर्जी से हुआ हैं ऐसा क्यू कहता हैं और सारा दोष नियति पर ही क्यू डालता हैं। नियति वास्तव में होता क्या हैं और यह कैसे कार्य करती हैं। आइए जानने का कोशिश करते है।


हमारी नजरो में नियति है क्या हैं यह में आपको सधारण भाषा मैं समझाने की कोशिस करूँगा। जो मैं अब तक समझ पाया हूँ जहाँ तक मुझे समझ मैं आया हैं।  यह जरुरी नहीं हैं की मैं जो कह रहा हूँ वह सत्य हैं यह आपके बिवेक पर निर्भर करता हैं की आप किसी तथ्य को कैसे देखते हैं।


परमात्मा :- यह ईश्वरीय प्रोग्राम है जो एक नियम के द्वारा चलती है या फिर यूं कह ले की संपूर्ण विश्व एक नियति हैं और इस नियति के अंदर अनंत नियति है जिसकी गणना हम आप या कोई और नहीं कर सकते हैं।  यह हमारी बुद्धि ज्ञान से परे हैं क्योंकि हमारी बुद्धि और ज्ञान की सीमा प्रकृति के द्वारा निश्चित कर दी गई है।  जैसे मान लीजिए कि हम किसी उड़ती हुई पंछियों को देख रहे हैं और हम उसे वहीं तक देख सकते हैं जहां तक देखने की क्षमता हमारे पास है उससे आगे हम नहीं देख सकते हैं और वह पक्षी उड़ती हुई कुछ दूर चली गई इसका मतलब यह नहीं कि वह पंछी आगे उड़ नहीं रही है वह उड़ रही है पर हमारे आंखों की इतनी क्षमता नहीं है कि हम उसे आगे तक देख सके इसी तरह नियति को समझने की जो विवेक हमारे पास है उसकी अपनी एक सीमा है और उस सीमा से हम आगे नहीं जा सकते हैं। हां उसे अनुभव अवश्य कर सकते हैं पर अनुभव हम तभी कर सकते हैं जब हम अपने आप को शून्य कर ले शांत हो जाए तो फिर वह सब संभव है जो हमारे ज्ञान से परे हैं। हम अपनी भौतिक शरीर में रहकर उस परे तक जा सकते हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते है। वहाँ तक जाने के लिए हमें अपने आप को इस नियति के प्रति समर्पित होना होगा अर्थात अपने आपको ईश्वर बनाना होगा जहाँ तेरा -मेरा, अपना -पराया, लाभ -हानि, मोह, अहंकार इत्यादि गुणों को समाप्त करना होगा तभी ईश्वर बन पाना संभव है अन्यथा यह असम्भव है। 


परमात्मा ने हर एक को नियति प्रदान की है और वह अपनी नियति के अनुसार कार्य करती है। केवल मनुष्य ही है एक ऐसा प्राणी हैं जो इस नियति के परे जा सकती हैं किंतु हमें वहां तक जाने के लिए तीन बाधाओं को पार करना होगा जो निम्न्न हैं। 


सवभाव :- हर मनुष्य की अपनी एक स्वभाव  होती है और वह अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करती है जैसे नदी ,नदी का स्वभाव होता है नीचे की और बहना वह कभी ऊपर की ओर नहीं बहती हैं और नदी अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं कर सकती हैं परन्तु प्रभावित अवश्य होती है। किंतु मनुष्य अपने स्वभाव में परिवर्तन कर सकता है और परिवर्तन करने से ही उसकी नियति बदल जाती है और वह उस मुकाम को छू लेता है जिसका वह कभी कल्पना भी नहीं किया था। यदी वह अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं करता हैं और एक ही स्वभाव को पाले रखता है तो वह एक विशेष मनोदशा में चला जाता है और वह मनोदशा ही उसकी नियति बन जाती है।



 मनोदशा :-  एक ही स्वभाव को पाले रहना और उसमें परिवर्तन ना करने से वह एक विशेष मनोदशा में चला जाता है। जैसे एक बच्चा बचपन से चोरी करता है और जवानी तक आते आते वह चोर बन जाता है वह अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं करता है तो वह चोरी करने की मनोदशा को प्राप्त कर लेता है इसे ही हम मनोदशा कहते हैं। आपकी जैसी मनोदशा होगी वैसा ही आपका भविष्य होगा और जो मनुष्य अपनी मनोदशा से ऊपर उठ जाता है वह नियति के परे को देखता है वह ईश्वर हो जाता है। 



प्रभाव :- हमारे स्वभाव पर जब किसी का प्रभाव पड़ता है और हम उसके अनुसार ही कार्य करते हैं तो उसे प्रभाव कहते हैं अर्थात अपना स्वभाव को त्याग कर दूसरे के स्वभाव को ग्रहण कर लेना ही प्रभाव कहलाता है हर मनुष्य अपने जीवन में प्रभावित होता रहता है।  जैसे पानी का स्वभाव बहना है यदि हम उसे जीरो डिग्री तापमान पर ले जाए तो वह बर्फ बन जाता है। अर्थात् पानी उस वातावरण के स्वभाव को ग्रहण कर लिया है तो उसे अब बर्फ कहा जाएगा पानी नहीं और ठोसपन उसका नियति बन जाता है। 



इस प्रकार देखा जाए तो मनुष्य किसी बुरे प्रभाव में आकर वह बुरा बन जाता है और यह उसकी नियति बन जाती है और जब उसका परिणाम आता है तो वह दूसरे को दोष देता है।यदी कोई दोष ना मिले तो कहता है कि यही मेरा नियति है जिसका निर्माण वह खुद किया है। यदि वह चाहता तो अपनी नियति में परिवर्तन कर सकता था और वह उस परम ऊंचाई को छू सकता था। 



अर्थात हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि नियति पानी की तरह होता है जिसमे मिला दो वो वैसा ही बन जाता है और जो अपने आप को शून्य कर लेता है और प्रकृति के नियति द्वारा कार्य करता है वह सभी बाधाओं से मुक्त होकर इस नियति के चक्रव्यूह से बाहर निकल जाता है क्योंकि स्वभाव से ही नियति की निर्माण होती है।

                                                               जय वासुदेव श्री कृष्ण  

Wednesday, December 5, 2018

December 05, 2018

Wisdom and Knowledge

                                            विद्या और ज्ञान 

विद्याऔर ज्ञान इस दोनों शब्द का अर्थ हमलोग एक ही निकालते हैं। पर वास्तव मैं दोनों मैं भारी अन्तर हैं एक सीमित हैं तो दूसरा असीमीत हैं एक का अनुसरण सारा जग करता हैं तो दुसरा बड़ा अनमोल हैं जो भाग्यशाली को ही मिलता हैं अब प्रशन उठता हैं की कैसे हम समझे की दोनों मैं भारी अन्तर हैं तो आइये इसे समझने का कोशिस करते हैं।

 हमारी नजरो में विद्या और ज्ञान क्या हैं यह में आपको सधारण भाषा मैं समझाने की कोशिस करूँगा। जो मैं अब तक समझ पाया हूँ जहाँ तक मुझे समझ मैं आया हैं।  यह जरुरी नहीं हैं की मैं जो कह रहा हूँ वह सत्य हैं यह आपके बिवेक पर निर्भर करता हैं की आप किसी तथ्य को कैसे देखते हैं।


a/विद्या  :- विद्या हैं क्या जो हम स्कुल से प्राप्त करते हैं। जी हा किन्तु मैं केवल इसी का बात नहीं कर रहा हूँ मैं यहाँ वह तमाम कला की बात कर रहा हूँ  जो हर एक व्यक्ति के पास अपनी जीविका को चलाने के लिए एक कला होती हैं जिसके माध्यम से वह अपना जीवन यापन करता है किन्तु फिर भी वह दुखी और निराश हैं क्यू इसके क्या कारण हैं इसी तरह मेरे मन मैं प्रशन उठते हैं आपके मन में भी उठते होंगे इसे ही जानने का कोशिस करता हूँ मैं यहाँ विद्या को दो श्रेणी में बाटता हू एक विद्या दूसरा कला। 

१/ प्रथम श्रेणी :- यहाँ मैं उस विद्या की बात कर रहा हु जो हम स्कुल से प्राप्त करते हैं किसी संस्था से प्राप्त करते हैं इसे लेकर हम डॉक्टर ,इंजीनियर ,वकील जस्टिस मैनेजर इसी तरह नाना प्रकार के इस विद्या के नाम पड़े हैं  फिर भी खुश नहीं हैं और अपने आपको एक पिंजड़ा में पाते हैं क्यू ?


 इसका उत्तर कुछ इस प्रकार है की मान लीजिये की Z  नाम का व्यक्ति ने कानून का निर्माण किया अब इस कानून को A से लेकर Y तक का मनुष्य इसे ग्रहन कर रहे अर्थात यह सभी Z की भाषा बोल रहे इनका अपना कुछ नहीं हैं जब हम किसी का भाषा बोलते हैं तो हमे तोता कहा जाता हैं जिसने केवल रटना सीखा और रटने के कारण ही यह पिंजड़े में हैं और पिंजड़े का तोता बोल तो सकता हैं पिंजड़े में घुर सकता हैं पर उड़ नहीं सकता यहाँ उड़ सकता हैं तो केवल Z उड़ सकता हैं क्यूकि उसने अपनी भाषा बोला हैं वह इन लोगों के भाति रटा नहीं हैं और Z इतना उड़ रहा हैं की सारी दुनिया इन्ही का भाषा बोल रहा हैं तो भाई Z बनो तभी उड़ सकोगे नहीं तो सारा जीवन पिजड़े में ही रहोगे।

 अब यहाँ प्रशन उठता हैं की कोनसा पिंजड़ा किस पिंजड़े की बात कर रहे हैं तो मैं प्रकृति के पिंजड़े की बात कर रहा हूँ यहाँ जो ओरो की भाषा बोलता हैं वह जीवन और मृत्यु के पिजड़े में कैद रहता हैं क्यूकि प्रकृति ने आपको अपनी भाषा बोलने के लिए भेजा हैं और आप ओरो की भाषा बोल रहे हैं यहाँ जो ओरो की भाषा बोलता हैं वह प्रकृति के पिंजड़े से कभी नहीं छूटता हैं। और ना ही प्रकृति इनका साथ देती हैं।


२/ द्वितीय श्रेणी:-इस श्रेणी में कला आती हैं जिसे हम अपनी परम्परा से प्राप्त करते हैं जैसे एक रिंग मास्टर शेर को उछलना -कूदना सिखाती हैं वैसे ही हमारे बाप -दादा और गुरु यह कला सिखाती हैं की सीख ले बेटा जीवन में काम आएगा और हम सीखते हैं इसलिए सीखते है की ताकि मेरा जीवन सुखी रहे पर क्या हम वास्तव में सुखी होते मुझे तो नहीं लगता की हम सुखी होते हैं थोड़ा सोचे की एक क्या रिंग मास्टर के अधीन रहकर सुखी रह सकता हैं कभी नहीं तो फिर हम जंगल की और चले तभी हम सुखी रह सकते हैं क्यू शेर होकर भी हम पिंजड़े में हैं जब तक हम इस पिंजड़े में हैं तब तक हमे वह जंगल का आनंद नहीं मिल सकता हैं। जंगल अर्थात प्रकृति का आनंद और मुझे प्रकृति का आनंद तभी मिलेगा जब हम अपनी भाषा बोलेगे जब तक हम ओरो की भाषा बोलेंगे तब तक हम पिजड़े में ही रहेंगे।


b/ज्ञान :-   ज्ञान क्या हैं और यह क्या सभी के पास है जी हा यह सभी के पास हैं किन्तु हम उस ज्ञान का प्रयोग नहीं करते जो हमारे भीतर हैं इसके प्रयोग ना करने के कई कारण हैं जैसे लाभ -हानि ,तेरा -मेरा ,उच्च -नीच ,मोह ,इस्या इत्त्यादि। इन सभी कारणों से हम अपने ज्ञान का प्रयोग नहीं कर पाते और बिना कुछ किये हम यहाँ से चले जाते हैं जिसके कारण हमारा सारा जीवन व्यर्थ हो जाता हैं।


परमात्मा ने प्रत्येक मनुष्य को एक अद्धभुत ज्ञान प्राप्त किया हैं। इस दुनिया में ऐसा एक भी मनुष्य नहीं जिसके पास एक विशेष ज्ञान ना हो सभी मनुष्य के पास एक अवश्य होता यदि हम उसे पहचान ले तो सारी दुनिया को अपनी जेब में लेकर घूरेंगे किन्तु हम ऐसा कर नहीं पाते कारण अपने ज्ञान को ना पहचान पाना।


अब इस ज्ञान को पहचाने के लिए या उसे अमल में लाने के लिए हमे किसी गुरु या स्कुल में नहीं जाना यह तो हमारे भीतर है जैसे जब कोई जानवर या फिर मान लीजिये एक कुत्ता जब यह अपने बच्चे को जन्म देता हैं तो वह अपने बच्चे को क्या सिखाता हैं कुछ भी नहीं किन्तु जीवन में जिस भी समय जिस ज्ञान की आवश्कता होती वह उस समय प्रकट हो जाता जैसे आप किसी कुत्ते को तालाब में फेंक दीजिये तो आप देखंगे की वह तैर कर बड़े आराम से बहार निकल जाता हैं तो यह प्रशन उठता हैं की यह तैरना उसे किसने सिखाया किसी ने नहीं तो यह ही ज्ञान हैं जो अपने -आप निकलती हैं और हम मनुष्य बचपन से अभी तक सिखने में लगे हैं। किन्तु अब तक सीख नहीं पाए तो आईये जानते हैं की हम अबतक क्यू नहीं सिख पाए।


१/ माता -पिता : प्रत्येक माता -पिता अपने संतान को बड़ा लाड़ -प्यार से पालता हैं उसके हर जरुरत को पूरा करता है किन्तु उसे उस ऊचाई तक नहीं पहुँचा पाता हैं जिस उचाई पर पहुँचने के लिए उसे परमात्मा ने भेजा हैं ऐसा क्यू क्यूकि परमात्मा ने उसे जो ज्ञान दिया हैं उस ज्ञान का प्रयोग कर नहीं पाता हैं। यहाँ पर माता के कुछ अलग सपने हैं जिसे वह अपने समय में पुरा कर नहीं पाता तो इसे वह अपने संतान के द्वारा पुरा होता देखना चाहता दूसरी तरफ पिता के भी कुछ सपने हैं वह भी अपने सपने को संतान के द्वारा पुरा होते देखना चाहता हैं और संतान कुछ ओर करना चाहता हैं पर संतान ऐसा कुछ कर नहीं सकता क्यूकि वह नदान अज्ञानी हर संतान अपने माता -पिता के लिए नदान और अज्ञानी ही होता हैं तो संतान की कुछ चलने वाली हैं नहीं रही बात माता -पिता की तो उसमे जिसका पलड़ा भारी होगा संतान उसका ही सपना पुरा करेगा इस तरह संतान के पास जो प्रतिभा थी वह भीतर ही दब गई उसे जो परमात्मा ने जो ज्ञान देकर भेजा था वह उसे वापस लेकर जायेगा।


२/ परिवार :-  इनकी तो बात ही मत करिए ये तो आलू -प्याज के भाव ज्ञान बेचते हैं सम्पूर्ण जगत में यहीं तो एक ज्ञानी हैं ये कर लो ,व कर लो ,इसे करने ऐसा होता हैं वैसा होता हैं और ना क्या -क्या कहकर उस बच्चे कहाँ ढकेल देते जहाँ से वह कभी निकल ही ना पाय यदि आप ना मने तो उधारण भी देंगे की फला ने ऐसा किया तो ऐसा हुआ आप भी कर लो तो भला हो जायेगा इतना भला होता हैं की सारा जीवन चिंता में ही गुजर जाती हैं।


३ /स्कुल ,कॉलेज और विश्वविद्यालय  :-  यहाँ पर दो प्रकार के बच्चे आते है और दोनों एक साथ पढ़ते हैं जिसमे एक का जीवन आबाद होता है हैं तो दूसरा का बरबाद  तो आइए जानते हैं की एक आबाद तो दूसरा बरबाद


प्रथम बच्चा :- यह वह बच्चा हैं जो इसी के लिए बना हैं इनके अन्दर  एकाग्रता कूट -कूट कर भरी होती है जिसके कारण यह हमेशा अव्वल आता हैं और अपने जीवन में कुछ ऐसा कर देता हैं जिससे सारा जग़त को लाभ होता है तो क्या यह ज्ञान इसे स्कुल ,कॉलेज और विस्वविदायलय ने दिया नहीं यह तो इसके भीतर ही था बस इन्होने इसे सवारा हैं।

 द्वितीय बच्चा :- यह वह बच्चे हैं जिसे कुछ ओर बनना था और यह कुछ ओर बनने चले आए इनके साथ एक तरह से जबरदस्ती हो गई जिसके कारण यह पढ़ाई ऐसे करते हैं जिसका हमारे समाज में कोई मोल नहीं हैं अब यह जाय तो कहाँ जाय बस ठोकर खाते फिरता हैं यह तो पढ़ाई ऐसे की की ना ऑफीसर बन पाया और ना ही मजदुर।

c/कोण हैं ज्ञानी :- ज्ञानि वह हैं जो तोतो की भाषा नहीं बोलता वह अपनी भाषा बोलता हैं और जो अपनी भाषा बोलता है वह कोयल के भांति होता हैं जिसे कोई पिंजड़ा में कैद नहीं करता हैं। विद्या तो हम मनुष्य से प्राप्त करते हैं जो यहाँ आकर सीखता हैं परन्तु ज्ञान जन्म से ही प्राप्त होता हैं किन्तु मनुष्य उसपर धयान नहीं देता और विद्या प्राप्त करने में मनुस्यो में होड़ लगी रहती है जिससे केवल भौतिक सुख प्राप्त होता हैं जिसे पूर्ण रूप से पाकर भी दुःखी होता हैं और शांति को ढूंडता पर उसे शान्ति प्राप्त नहीं होता हैं क्यूकि मनुष्य ने विद्या को अधिक महत्तव दिया हैं और ईस्वर के द्वारा दिया ज्ञान पर कभी विचार नहीं किया हैं। जिसके कारण वह दब गया हैं हम भली -भाती जानते हैं की विद्या का जन्म ज्ञान से हुआ हैं जैसे आपकी इच्छा शक्ति प्रबल ना हो तो आप किसी विद्या को प्राप्त नहीं कर सकते हैं।


ज्ञान की मात्रा जिस व्यक्ति में जितना होता हैं उसके अनुपात के हिसाब से ही विद्या प्राप्त करता हैं यहाँ वह विद्या  तो प्राप्त कर लेता है और ज्ञान को भूल जाता हैं जिससे ज्ञान का ना बहने से वह अधिक ऊंचाई पर नहीं चढ़ पता हैं अर्थात जन्म के समय उसे जो ज्ञान ईस्वर से प्राप्त होता उसे वह बढ़ाता नहीं हैं उसी मात्रा में छोड़ देता हैं और संसार के भौतिक सुख के प्रति लालशा को बढ़ाबा देता हैं और उसे प्राप्त करके भी दुःखी होता हैं यदि ना हो तो भी दुःखी होता हैं वास्तव में दुःख का कारण ज्ञान का ना होना हैं यदि मनुष्य के पास ज्ञान प्रथम स्थान पर हो और विद्या दूसरे स्थान पर हो तो मनुष्य को दुःख होगा ही नहीं।


ज्ञान को आज की दुनिया में कोई भी महत्तव नहीं देता हैं परन्तु आज जो कुछ भी निर्मित होता हैं वह ज्ञान से ही होता है ऐसे कितने  वैज्ञानिक है जिसने स्कुल ,कॉलेज और विश्वविद्यालय ना के बराबर गये हैं उनमे से एक हैं थामस ऐल्वा एडिसन।यह सभी जानते हैं और सभी को पता हैं जिसने बल्ब का अविष्कार किया जिससे आज सारा जगत रोशन हैं। ऐसे हम भली - भाति जानते हैं की विज्ञान का जन्म ज्ञान से ही होता है जो कुछ गिने चुने लोगो को ही प्राप्त होता हैं और जिसे प्राप्त हुआ है वह अमर हो गया है जैसे श्री राम चन्द्र ,वासुदेव श्री कृष्ण ,गौतम बुध ,वेद व्यास ,तुलसी दास ,कबीर दास ,रहीम दास इत्त्यादि। इन सभी को ज्ञान प्राप्त हैं और आज हम जो कुछ भी पा रहे हैं वह सब इन्ही का देन हैं आज जो हमलोग प्रगति किये हैं वह सब इन्ही का देन हैं। क्यूकि इन्ही लोगो ने जीवन का सही मतलब समझाने में सफल हुआ है।
                                                           जय वासुदेव श्री कृष्ण 

Saturday, December 1, 2018

December 01, 2018

FEAR OF DEATH

                                                मृत्यु का भय 

मृत्यु वह वास्तिविक घटना है जो परिवर्त्तन चक्र के लिए अनिवार्य हैं। परन्तु मनुष्य इससे अधिक भयभीत रहता हैं इसके कई कारण हैं जो मनुष्य अपने जीवन के बाद इस संसार के प्रति अपने मोह के कारण अधिक भयभीत होता हैं और दूसरा मरने के बाद मेरा क्या होगा इस चिंता से भयभीत होता हैं। ऐसे देखा जाय तो मृत्यु के प्रति भय के कई कारण है जो कुछ इस प्रकार हैं।


हमारी नजरो में भय क्या हैं यह में आपको सधारण भाषा मैं समझाने की कोशिस करूँगा। जो मैं अब तक समझ पाया हूँ जहाँ तक मुझे समझ मैं आया हैं।  यह जरुरी नहीं हैं की मैं जो कह रहा हूँ वह सत्य हैं यह आपके बिवेक पर निर्भर करता हैं की आप किसी तथ्य को कैसे देखते हैं।



१ इच्छा :-   प्रथम भय मनुष्य की इच्छा होती जो ना कभी समाप्त होने वाली हैं।  इच्छा ऐसी एक भावना हैं जो एक पूरा हो तो दूसरा इच्छा का जन्म हो जाता हैं ,दुसरा  पूरा हो तो तीसरा ,तीसरा पुरा हो ,तो चौथा इस तरह इसका क्रम यु ही चलता रहता हैं।


और इस तरह मनुष्य के जीवन में उसका अन्तिम समय आ जाता हैं और कई इच्छा को पुरा नहीं कर पाता हैं। इस इच्छा के प्रति उसके मन में जो मोह उत्पन होता वह मोह एक विराट रूप ले लेता हैं और इस मोह के कारण उसे अपने जीवन से अधिक लगाव हो जाता हैं और यह लगाव ही मृत्यु के भय उत्पन करता हैं।


मृत्यु तो अटल हैं वह तो आएगी ही इसी सत्य से मनुष्य घबराने लगता हैं और भयभीत होता हैं। इस सत्य को समझ नहीं पाता की यह जीवन प्रकृति का मेहमान है जो कुछ पल के लिए है।


२ परिवार :- यह दुसरा कारण हैं जो मृत्यु के प्रति भयभीत करता हैं। प्रतेक मनुष्य को अपने परिवार के प्रति इतना अधिक मोह होता हैं की जिसे वह ना छोड़ना चाहता हैं और ना ही उससे दूर जाना चाहता है जो वास्तब में उसका हैं ही नहीं। किन्तु मोह कारण वह उसे अपना समझ बेठता इतना ज्यादा अपना समझ बैठता हैं की मनो उसका परिवार जन्म जन्मान्तर तक उसके साथ रहगे।


 इस संसार में तो अपना पुत्र २५ वर्ष के बाद साथ छोड़ देता हैं जिसे हमने अपने कलेजे से लगा कर ,ना खा कर उसे खिलाया वह एक दिन हमे बोझ समझ कर साथ छोड़ देता हैं।


रही बात अब जीवन साथी की तो वह भी हमारा साथ नहीं देता विवाह के समय ७ जन्म तक साथ निभाने की कसम खाता और ढंग से तो एक जीवन निवाह नहीं पाता।


और अब पुत्री जब पुत्र और जीवन साथी हमारा साथ छोड़ दिया तो पुत्री हमारा साथ कैसे देगी जो विवाह के बाद दूसरे कुल में चली जाती हैं वह तो पहले ही भाग जाती हैं तो उनसे आशा रखना मूर्खता होगी।


इस तरह देखा जाय तो हमारा साथ कोई नहीं हैं तो फिर इतना मोह क्यू जो हमे मृत्यु के समय अधिक पीड़ा देती हैं यदि हम मोह को त्याग दे तो हमे मृत्यु के समय कोई पीड़ा नहीं होगी और हम ख़ुशी -ख़ुशी चले जायेंगे।


  अपने उद्धगम स्थान का पता ना होना :- मृत्यु के प्रति तीसरा भय का कारण यह होता हैं की उसे यह पता नहीं होता की मरने के बाद हम कहाँ जायेंगे किन्तु हम कहाँ जायेंगे यह जानना जरुरी हैं की मृत्यु के बाद क्या होगा और इसे जानने का केवल एक ही रास्ता हैं ध्यान।


जब हम किसी फ़िल्म या प्रोग्राम को देखना चाहते हैं तब हमे एक यंत्र की जरुरत पड़ती हैं जैसे T.V ,कम्प्यूटर इत्यादि। यदि यह यंत्र ना हो तो हम फ़िल्म या प्रोग्राम कभी नहीं देख सकते। इस यंत्र के अभाव में सब वयर्थ हैं


उसी प्रकार इस दुनिया को देखने के लिए ,समझने के लिए मनुष्य शरीर रूपी यंत्र का होना अनिवार्य हैं छूना ,देखना ,बोलना सुनना और अनुभव यह सारे शरीर के द्वारा ही होता हैं जैसे हम कुछ देखते हैं तो उसपर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। आँख से ही हमे प्रकाश ,रंग और आकार का बोध होता हैं यदि हम अपनी आँख बंद कर ले तो केवल अंधकार का बोध होता हैं अर्थात मृत्यु के बाद कुछ ऐसी ही घटना घटती हैं।



 जो मनुष्य मनुष्य शरीर में रहकर मृत्यु के बाद का रास्ता का ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाता उसे मृत्यु के बाद केवल अन्धेरा दिखाई देता हैं। जिसके कारन उसे कुछ समझ में नहीं आता और वह इधर -उधर हाथ -पैर मरता हैं यह क्रिया उसके साथ एक दिन ,एक महीना ,एक वर्ष या कई युग तक चलता रहता हैं। जहाँ कोई निश्चित समय नहीं होता यहाँ वह अन्धेरे में चलता है जहाँ उसे कुछ ज्ञात नहीं होता औऱ वह अचानक किसी योनि में प्रवेश कर जाता हैं। फिर उसका एक नया जन्म होता हैं यदि वह अन्धेरे में मनुष्य योनि में प्रवेश करता हैं तो उसे दोबारा अवशर प्राप्त होता हैं यह जानने के लिए की मैं कोन हूँ।यदि वह किसी और योनि में प्रवेश कर जाता हैं तो यहाँ से उसकी गिनती फिर से एक से शुरू हो जाती हैं।



 जिस मनुष्य को थोड़े बहुत रास्ते का ज्ञान होता हैं तो वह मृत्यु के बाद भूत -प्रेत बन जाता हैं और इधर-उधर  भटकता हैं। भटकने के कारण उसकी इच्छाऐ होती हैं जिसे वह मनुष्य योनि में पूरा नहीं कर पाया था उसे  पुरा करने के लिए मनुष्य को परेशान करता हैं क्यूकि उसे यह पता होता हैं की अपनी इच्छा पुरा करने के लिये मनुष्य शरीर का होना आवश्यक हैं पर उसे यह नहीं पता होता हैं की मनुष्य योनि कैसे प्राप्त होगी इसलिए मनुष्य शरीर पाने के लिए मनुष्य को परेशान करता हैं। यह क्रिया उसके साथ अनिश्चित काल के लिए चलता रहता हैं और अन्ततः एक दीन वह मनुष्य योनि में प्रवेश कर जाता हैं। उसे फ़िर एक मनुष्य जन्म प्राप्त होता हैं की यह जानने के लिये की मैं कौन हूँ।


 जिस मनुष्य को आधा या आधे से अधिक रास्ते का ज्ञान होता हैं वह मृत्यु के बाद उसे दोबारा मनुष्य योनि प्राप्त करने के लिये इन्तजार करना पड़ता हैं यह इन्तजार अनिश्चित होती हैं ताकि पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो सके। जिस मनुष्य को रास्ते का पुर्ण ज्ञान हो जाता हैं वह सरलता से अपने उद्धगम स्थान पर पहुँच जाता हैं


अतः हमारा यह मानना हैं की सरे दुखो का जड़ हमारी इच्छा हैं तो क्यू ना हम इस इच्छा को ही मार डाले और जो हैं जैसा है जितना है उतना ही मैं सन्तुष्ठ रहे तो निश्चित ही हमारा जीवन खुशियों से भर जायेगा तो फिर हमे ना मरने का भय होगा और ना कुछ पाने की जिद जब हमारे पास कुछ रहेगा ही नहीं तो भय कैसा फिर आंधी आये तुफा आये या फिर मृत्यु ही क्यू ना आ जाए।
                                                                        जय वासुदेव श्री कृष्ण



    

Monday, November 26, 2018

November 26, 2018

HOPE

                                                    आशा 


आशा एक ऐसा अध्य्रिश शब्द हैं जिसे ना कोई देख पाया और ना कोई समझ पाया। इस जीव -जगत की हर प्राणी आशा के सहारे अपनी सारा जीवन जी लेता हैं। इस दुनिया की कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जो दुखी ना हो।



 कोई नाम कमाना चाहता हैं ,किसी को परमात्मा की आशा हैं ,किसी को ऑफिसर बनना हैं ,किसी को डॉक्टर तो किसी को इंजनियर बनने की आशा होती हैं। यह सारे अपनी इच्छा -शक्ति यह आशा तो पूरा कर लेते हैं और फिर एक नये आशा का जन्म होता हैं और उसे पूरा करने में लग जाता हैं।


 इस तरह आशा कभी समाप्त नहीं होता हैं और जीवन पुर्ण रूप से सुखी नहीं हैं यह जीवन चक्र ही कुछ ऐसा हैं। यदि आप आशा को समझ जाते हैं तो जीवन को अपने -आप समझ जायेंगे ,पर इसे समझना बड़ा मुश्किल हैं समझो ना के बराबर हैं।


जब मानव अपने जीवन की अन्तिम पड़ाव में आ जाता हैं तो उसे यह सारी दुनिया समझ में आ जाता हैं। उसने क्या गलत और क्या सही किया इस समय सब उसे समझ में आता हैं की जीवन कुछ भी नहीं हैं इस तरह अपने सभी कर्मो का पश्चाताप करते हुए वह फिर आशा की तरफ एक और कदम बढ़ा देता हैं और ईश्वर से प्रार्थना करता हैं की है प्रभु हमे छमा करे और अपनी चरणों में जगह दे।  यह भावना लेकर वह आगे बढ़ जाता हैं इस तरह आशा कभी समाप्त नहीं होती और अपनी गति अनुसार चलती रहती हैं।



मरने के बाद भी मनुष्य यही आशा करता हैं की मुझे स्वर्ग मिले अर्थात मानव -जाती कभी भी सन्तुष्ठ नहीं होता हैं इसलिए मानव -जाती सबकुछ पाकर भी दुःखी होता हैं उसे लगता हैं की मैंने कुछ नहीं पाया मुझे और कुछ पाना चाहिये।


जब मनुष्य इस दुनिया की सभी भौतिक सुखो से गुजर जाता हैं तो वह ईस्वर की शरण में जाता हैं और परमात्मा को पाने की चाह रखता हैं इस तरह देखा जाय तो आशा कभी समाप्त नहीं होता और यह आशा के कारण सम्पूर्ण जीवन दुखी हो जाता हैं।


.जब इस आशा के कारण हमे पग -पग पर तकलीफ होता हैं तो फिर आशा क्यू रखते हैं इसे त्याग देना ही उचित हैं ना कोई आशा रहेगी और ना ही मुझे कोई तकलीफ होगी। यदि हमलोग यह आशा को त्याग देते हैं तो हमारा सारा जीवन खुशियों से भर जायगा।
                                                                       जय वासुदेव श्री कृष्ण  

Saturday, November 24, 2018

November 24, 2018

USE OF THE WORD

                                              शब्द का प्रयोग 


शब्द जो हमरे जीवन मैं अहम् भूमिका निभाता हैं हर शब्द का अपना एक वास्तिविक अर्थ होता हैं ऐसा कोई शब्द नहीं हैं जिसका कोई अर्थ ना हो यह शब्द अपने आप में ब्रह्म हैं जो हमारे जीवन को अन्तिम सिमा तक प्रभावित करता हैं।


यह बोलने ,लिखने और समझने में अहम भूमिका निभाता हैं। हमारे जीवन का कोई ऐसा पहलू नहीं हैं जो इससे बच जाय हमारे जीवन में या जगत में जो भी उथल पुथल होता हैं वह इन्ही शब्दो के कारण होता हैं।  चाहे वह राजनितिक हो ,सामाजिक हो या फिर आर्थिक हो यह हर जगह होता हैं



शब्द का प्रयोग जीवन के चारो तरफ होता हैं यह हमारे जीवन को ऊपर उठाता भी हैं और निचे गिराता भी हैं जिन लोगो को शब्दो पर पकड़ होता हैं वह पुरी दुनिया पर राज करता हैं एक नेता शब्द को राजनितिक हाथियार के रूप में प्रयोग करता हैं जो उन्हें रंक से राजा बनाता हैं और राजा से रंक बनाता हैं। पेशेवर वकील को यह शब्द ही न्याधीश बनाता हैं। यह शब्द ही जीरो से हीरो बनाता हैं और हीरो से जीरो बना देता हैं। यह शब्द ही हैं जो एक लेखक को महालेखक बना देता हैं। यह शब्द ही जो एक सधारण पुरुष को महापुरुष बनाता है।



 अर्थात यह शब्द अम्रित भी है और विष भी है। यह परिस्तिती पर निर्भर करता है की ज्वान  से निकला शब्द अम्रित बनेगी या विष। एक बार शब्द ज्वान से निकल जाय तो वह वापस नहीं होता हैं।


 इसलिए मनुष्य को शब्द का प्रयोग एक बार नहीं हज़ार बार विचार करके करना चाइये। शब्द से बड़ा घातक हथियार इस सम्पूर्ण जगत में नहीं हैं इसी तरह शब्द से मीठा अम्रित भी नहीं हैं यह बोलने वालो पर निर्भर करता हैं की वह क्या बोलेगा क्या उसने बोलने से पूर्व यह विचार किया हैं की इसका क्या परिणाम होगा।


शब्दो का बड़ा प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता हैं यह किसी के जीवन को बदलने का पूर्ण सामर्थ रखता हैं यह किसी भी मनुष्य को अच्छे  से बुरा और बुरा से अच्छा बना देता हैं। इसलिए शब्द का प्रयोग सोच -समझ कर करना चाइये।

                                                                           जय वासुदेव श्री कृष्ण     

Friday, November 23, 2018

November 23, 2018

VIRTUE AND SIN


                                              पूण्य और पाप


पूण्य और पाप धर्म -अधर्म का माप -दंड है किन्तु यह माप दंड मानव -जाती के कर्म पर निर्भर करता हैं। परन्तु मानव जाती के लिए असुभिधा यह हैं की कौन सा कर्म पाप हैं और कौन सा कर्म पूण्य हैं अब तक सधारण मानव जाती समझ नहीं पाया हैं की क्या पाप हैं और क्या पूण्य हैं।

 हमारी नजरो में पूण्य क्या हैं यह में आपको सधारण भाषा मैं समझाने की कोशिस करूँगा। जो मैं अब तक समझ पाया हूँ जहाँ तक मुझे समझ मैं आया हैं।  यह जरुरी नहीं हैं की मैं जो कह रहा हूँ वह सत्य हैं यह आपके बिवेक पर निर्भर करता हैं की आप किसी तथ्य को कैसे देखते हैं।

पूण्य दो शब्दो से मिलकर बना हैं पू और अन्य, पू का अर्थ होता हैं पूजा और अन्य का अर्थ होता हैं कोई ओर अर्थात ओरो की पूजा करना ही पूण्य है। ओरो के प्रति आपका मन साफ हो ओरो के प्रति आप हमेशा तत्यपर रहे ,उनका साथ दे यदि वह भटक गया हैं तो आप अपनी ज्ञान के माध्यम से उसे राह पर लाए न की इस्या करे यदि बिगड़ गया हैं तो उसे सुधारे उनकी कामयाबी मैं उनका साथ दे उन्हे आगे बढने के लिए प्रेरित करे यदि वह अपना अत्मविस्वास खो दिया है तो उसे आत्मविस्वास दिलाये इन सभी क्रिया कलाप से आप पूर्ण रूप से पूण्य कर सकते है।

 परन्तु लोग कहते की पूजा करना पूण्य है। हमारे नजरों में पूजा दो आत्मा का मिलन हैं एक आत्मा और दुसरा परमात्मा ,परमात्मा में अपने आपको बिलीन करना और परमात्मा का अर्थ होता है सम्पूर्ण जगत जिसमे मैं ,हम आप ,यह ,वह सभी आता हैं।

 परमात्मा से मिलने के लिये कोई विधि -विधान जरुरी नहीं हैं लेकीन हम पूजा करते है तो वह भी आधा -अधुरा मन से जब आप पूजा करते है उस समय अगरबत्ती या फल गिर जाय तो आप सोचने लगते है की कही हम से कोई भूल तो नहीं हो गई उसके लिये आप छमा याचना शुरू कर देते है।

अर्ताथ आपका मन आत्मा पहले से ही साफ नहीं और आप डरे -डरे उस परमात्मा को याद कर रहे जो आपका माता -पिता हैं जिसका आप अंस हैं ,जब कोई बच्चा गलती करता हैं तो उसका माता -पिता दण्ड देता और वह दण्ड उसके लिये सोभाग्य बन जाता हैं। जब माता -पिता का दण्ड बच्चे को हानि नहीं पहुँचता हैं तो परमात्मा का दिया हुआ दण्ड आपको हानि कैसे पहुंचा सकता हैं।


इसलिए मैं यह कहता हूँ की पहले अपने मन की इन विकार को निकाल दीजिये। मन की विकारो को निकालने की एक ही तरीका हैं की आप ओरो का उद्धार करें ओरो की उद्धार से ही आपका उद्धार हैं ओरो का उद्धार करना ही परम पूजा हैं ,पूर्ण पूजा हैं यह वह पूजा है जहाँ से परमात्मा की दरबार खुल जाती हैं जहाँ परमात्मा सम्पूर्ण रूप में दिखाई देता हैं। जहाँ आप परमात्मा में विलीन हो सकते हैं यहाँ आप परमात्मा को पा सकते हैं इस माया जाल से मुक्त हो जायेंगे यह ही सम्पूर्ण पूण्य हैं।


 पाप क्या हैं लोग पाप को अभी तक समझ नहीं पाया हैं की पाप है क्या पाप कैसे होता है इसका जन्म दाता कौन है तो मैं अपनी भाषा मैं कहता हूँ की इसका जन्म दाता आप है। पाप का अर्थ होता क्या होता है तो पा का मतलब होता है परमात्मा और आप का अर्थ आप स्वय है


अर्थात जब मानव अपने -आप को परमात्मा समझने लगता है तो इसे हम पाप कहते है। मानव अपने आप को परमात्मा तभी समझता है जब उसे अपूर्ण ज्ञान होता है। यही से अहंकार का जन्म होता है और वह जो करता है उसी को सही समझता हैं और दूसरे के कार्य को पाप समझता है क्यूकी दुसरा जो करता है वह उसके इच्छा के बिपरीत होता है।


ओरो का मदत ना करके उसका शोषण शुरू कर देता है जिसके कारण यह मानव समाज में कलंककित होता है फिर भी उसे समझ में नहीं आता है और अपनी लय में बहता चला जाता है और जब वह अपने जीवन के अन्तिम पड़ाव में पहुँचता है तब उनकी सारा बल समाप्त हो जाता है जहाँ वह गिर पड़ता है और अपने सभी कर्मो को देखता है और कहता है की मुझसे बड़ी भूल हो गई है इस जीवन का लक्छ क्या है मैं समझ नहीं पाया और वह पछताप करता है और परमात्मा की शरण में जाता है।


 जहाँ उसे पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है। परन्तु अब पूर्ण ज्ञान पाने से क्या लाभ जब आप किसी के काम नहीं आये और अपने किये के कारण उसे एक नया जीवन मिलता है। परमात्मा की ओर से ना पाप की सजा मिलती हैं ना ही पूण्य की यह तो आपके ही कर्म का फल है जिसे अपने जन्म दिया और आपको ही इसे पूरा करना हैं।


 परन्तु मानव परमात्मा को दोषी देता हैं परमात्मा को पुण्य और पाप से क्या लेना -देना वह तो हमेशा कहता हैं आओ तुम्हारा स्वागत है पर क्या आप उस स्वागत के काबिल है यदि आप वहाँ के काबिल नहीं है तो आप कभी नहीं पहुँच पायेंगे क्यूकी आपका क्रम आपको खींच लेगा और आपको अपनी पापो का भुगतान इसी माया नगरी में करना हैं।

 पाप और पूण्य यही हैं पाप एक माया का बिन्दु हैं और पूण्य परमात्मा का बिशाल रूप है जो आपका हमेशा इन्तजार करता हैं। परमात्मा ना जाने आपकी राह कब से देख रहा हैं की मेरा प्रिय अब आएगा। इसी इन्तजार में कई युग बीत गए और आप उसी माया में फॅसे हुए है आपको अपनी परमात्मा की याद आती ही नहीं तो आप वहाँ तक कैसे पहुँचेगे।
                                                                                             जय वासुदेव श्री कृष्ण
       

Wednesday, November 21, 2018

November 21, 2018

THE FORMS OF GOD

                                            परमात्मा का रूप    


परमात्मा का रूप कैसा होता हैं जैसा हमारे पूर्वजों ने बताया क्या वैसा ही होता हैं यदि नहीं तो फ़िर कैसा होता हैं क्या आपने कभी बिचार किया है नहीं किया है क्यू नहीं किया क्यूकि हमे कभी आवश्कता नहीं पड़ी क्यूकि हम अपने आप मै इतना उलझे हुए हैं की खुद की उलझन सुलझाते -सुलझाते खुद समाप्त हो जाते है पर उलझन समाप्त नहीं होता हैं।


परमात्मा एक ऐसा शब्द जहाँ हर कोई आकर रुक जाता हैं सारे बिचारो का उफान बस यह एक शब्द पर आकर रुक जाती हैं। बहुत कुछ देखते हैं, बहुत कुछ सुनते हैं, बहुत कुछ बोलते हैं लेकीन जब परिभाषित करने की बारी आती हैं तब हम मौन हो जाते हैं क्यूकि हम जानते ही नहीं की परमात्मा कौन हैं रहता कहाँ हैं दिखता कैसा हैं। 


इनका नाम आते ही हजारो प्रशन हमारे मन मैं उठने लगता हैं किन्तु उत्तर नहीं मिलता ओर उत्तर बड़ा सरल हैं। यदि मैं बता दू तो आप हँसोगे क्यूकि आप को हँसने की आदत हैं यदि मैं यह कह दू की आपकी हँसी ही परमात्मा हैं तब क्या करोगे। जरा सोचो दिमाग की बत्ती लाल बुलु हरा पीला हो जाएगी।


हम और आप और यह सारा जगत भली -भाँति जानता हैं की परमात्मा सर्वव्यापी हैं वह कण -कण मैं हैं और यह हम मानते हैं और हम अपनाते भी हैं। पर क्या हम वास्तब मैं अपनाते हैं बिलकुल नहीं जरा सोचे।

 जब हम अपने परिवार में या फिर बहार किसी से जागड़ा कर लेते है तो फ़िर हम उसे देखना पसन्द नहीं करते और दुसरी तरफ हम कहते हैं की परमात्मा कण -कण में हैं जब यह बात सत्य हैं तो फिर हम जिसे देखना पसन्द नहीं करते वह भी तो परमात्मा का ही रूप हैं। जब हम उसे नहीं अपना पाते तो परमात्मा को क्या खाक अपनाएँगे।

किसी एक से मुँह फेरने का अर्थ होता हैं परमात्मा की अस्तितव से मुँह फेरना। और हम परमात्मा की सवरूप की बात करते हैं उनका एक रूप को तो अपना नहीं पाते। पहले इन्हे तो अपना लीजिए इन्हें अपनाने से परमात्मा स्वता प्रकट हो जाएगी।

रही बात अब परमात्मा की रूप की तो परमात्मा का रूप इतना बिकराल हैं की वह हमारे बिबेक ,बद्धि से परे यदि हम उनका रूप देखना चाहें तो यह सम्भव नहीं हैं। हमारी आँखों की ,हमारी बुद्धि की उतनी छमता नहीं नहीं हैं की उन्हें समझ सके जिस तरह एक छोटी सी पात्र में समुन्द्र नहीं समा सकता उसी तरह इस छोटी सी शरीर के द्वारा परमात्मा को कहाँ तक समझ सकते हैं।

 यदि मैं कहुँ की ऐसा कौन सा पात्र हैं जिसमे समुन्द्र समा जाए कोई नहीं हैं यदि मैं कहुँ की क्यू ना ऐसी कोई पात्र बनाया जाय जिसमें सारा समुन्द्र आ जाय क्या हम ऐसा कर सकते हैं कभी नहीं। यदि सारा जगत मिलकर यह काम करें तो भी यह नहीं कर सकते या फ़िर यु कह ले की यह असम्भव हैं

जब हम परमात्मा की यह छोटी सी बनाई हुई अजुबा को हम कोई पात्र में नहीं ले सकते तो परमात्मा को कैसे समझ सकते है हम केवल परमात्मा की आस्तित्व का अनुभव कर सकते हैं। उनके द्वारा बनाए गए नाना प्रकार की जीव -जन्तु ,पेड़ -पौधा ,नदी -तालाब इत्यादि से आनन्द लें सकते हैं। यह आनन्द ही परमात्मा हैं ,यह अनुभुति ही परमात्मा हैं।

 दुसरी तरफ परमात्मा का रूप इतना ही सुच्छम हैं की हम उन्हें देख ही नहीं सकते और ना ही हमारे पास ऐसा कोई यंत्र जिसके द्वारा देखा जा सके जिस तरह हवा को हम नहीं देख सकते उसी तरह हम परमात्मा को भी नहीं देख सकते केवल  अनुभव कर सकते हैं।

 यहां तक की हम परमात्मा के रूपों की भी बियाख्या भी नहीं कर सकते अभी तक तो हमरे पास उनके द्वारा रचा हुआ जगत की पार्याप्त जानकारी भी नहीं हैं तो उनके रूपों की बियाख्या कैसे कर सकते हैं यह असम्भव हैं और यह असम्भव था और असम्भव रहेगा।                                                                                                                     जय वासुदेव श्री कृष्ण                 

Monday, November 19, 2018

November 19, 2018

MEDITATION EFFECT

                                            धयान का प्रभाव  


धयान हमारे जीवन पर बहुत  गहरा असर डालता है जो हमारी पूरी जीवन को बदल कर रख देता है। यह उस सत्य से अवगत कराती है  जिसकी  हमने  कभी कलपना भी नहीं की इस क्रिया में उस परम ऊर्जा का परवहा होता है जिसका हर व्यक्ति सहन नहीं कर पाता है।  जब यह ऊर्जा हमारे जीवन में उतरती है तो काफी उथल -पुथल  होता है इसी उथल -पुथल में कई लोग पागल हो जाते है इस समय सयम रखना बहुत जरुरी  हो जाता है  अन्यथा  कुछ भी हो सकता। 

इसके  बाद जीवन में केवल आनंद ही आनंद है फिर आप  जो  चाहोगे वही मिलेगा। अधयातम का अर्थ यह नहीं होता की आपके जीवन मैं कोई चमत्कार हो जाय चमत्कार तो तभी है जब आप सांत हो जाए सांत होना ही चमत्कार है जब आप कोइ कार्य सांत होकर करते है तो उस कार्य मैं आप निश्चित ही सफल हो जाते है और सफलता ही अपने आप मैं एक चमत्कार हैं यदि आप सोचते हैं की धयान करने से हमारे जीवन मैं कोई चमत्कार हो जाएगा तो ऐसा कुछ भी नहीं होता है।

धयान से हमारी शरीर मैं वह ऊर्जा की परवाह होती है जिससे हमारी सोइ हुई सारी इंदरिया जाग जाती जो हमे देखने ,सुनने और बोलने मैं ओरो की तुलना मैं बेहत्तर बनाती हैं। हमे किसी कार्य करने की जितनी ऊर्जा की आवयश्कता होती हैं उतनी ऊर्जा हमारा शरीर दें नहीं पाता हैं तो इस दौरान वह सारी ऊर्जा हमे बरह्माण्ड से प्राप्त होने लगता है अर्थात हमारा मस्तिष्क बरम्हमाण्डीय हो जाता और जब हम ब्रह्ममांडिये हो जाय तो पाना क़्या सेश रह जाता हैं।

जब यह ऊर्जा हमे प्राप्त होने लगती तो हमारे व्यव्हार मैं परिवर्तन आ जाती हैं। तब हम पाप -पुण्य,झुठ -सच ,तेरा -मेरा ,अपना -पराया इन सब से ऊपर उठ जाते है इतनी ऊपर उठ जाते है की जब भीड़ मैं चलते है तो अकेला दिखाई देता हूँ क्यूकि सम्पूर्ण भीड़ तो मैं ही हूँ तो बचा क्या। तब मेरा अपना परिवार नहीं ,समाज नहीं ,राज्य नहीं ,देश नहीं सम्पुर्ण जगत हैं फिर मेरा सारा सम्बन्ध जगत से हो जाता है

लेकीन कुछ लोग ऐसे भी होते जो इस रास्ते पर चलते -चलते थक जाते हैं और फिर आगे नहीं बढ़्ते इतना दुर आते -आते कुछ न कुछ अवश्य मिल जाता हैं जिसका या फिर यु कह ले की उस ऊर्जा का दुरुप्योग करता हैं समाज को हानि पहुँचता हैं और अंत मै ऐसे मरता है जैसे महापापी का अंत होता है। 

ये लोग जानते है की इस बुरे कार्य का परिणाम बुरा ही होगा फिर भी करते है और अपने बुरे कर्मो से बाज नहीं आते। समय इन लोगो को बार -बार चेतावनी देता हैं ऐसी बात नहीं हैं की समय इन लोगो को अगाह नहीं करता अवश्य करता हैं।

हम भली -भाँति जानते हैं की किसी भी चीज का दुरुपोग नहीं करना चाहिये अन्यथा उसका परिणाम बुरा ही होता हैं। अपने स्वार्थ के कारण बहुत कुछ गलत कर देते है जो करना उचित नहीं हैं किन्तु समय हमसे एक -एक पाई का हिसाब लेता है। समय का दंडविधान हमारे दंडविधान से कई गुना तीब्र गति से कार्य करती हैं। सावधान हो जाय और खुशी पूर्वक जीवन जिये।                                                                                                                                                                                                                                                      जय वासुदेव श्री कृष्ण          
                                                                                        

Thursday, November 15, 2018

November 15, 2018

RULES OF MEDITATION

                                            धयान के नियम 


धयान करने के हमने बहुत सारे नियम सुने है और किताबो मैं पढ़े है पर हमारे नजर मै इसका कोई नियम नहीं है यदी हम नियम को मानने लगे तो सारा जीवन नियम मानने मैं बीत जाएगी किन्तु नियम पुरा नहीं होगा क्यूकी हमारे पूर्वजों ने इतने नियम बना कर रखें है की जिसे पूरा करना सम्भव नहीं है।

तो अब प्रसन उठता है की धयान कैसे किया जाय जब हम कोई नियम ही नहीं मानेंगे तो धयान कैसे होगा। होगा अवसय होगा जहाँ कोई नियम ना हो वहाँ एक ही नियम कार्य करती वह नियम हैं आत्मा का नियम ,मन का नियम ,इच्छा का नियम

अब आत्मा का नियम ,मन का नियम ,इच्छा का नियम क्या हैं इसे कैसे किया जाय तो इसे करना बड़ा ही असान है बड़ा ही सरल और पवित्र हैं क्यूकी आत्मा ही परमात्मा हैं और परमात्मा से गलत हो जाय ऐसा हो ही नहीं सकता जो इतनी बड़ी बरम्हाण्ड को चलाता हो उस से ग़लती कैसे हो सकता हैं। यदि फ़िर भी हम उन पर प्रसन उठाते हैं तो हम से बड़ा मुर्ख कोई नहीं है।

 ,आत्मा का नियम वह नियम है जो सबसे श्रेष्ट है जहाँ आत्मा सात देता हो वह अतुल्य हैं। आत्मा हमारा वह मार्गदर्सक हैं जो हमें सही गलत का पहचान कराती है जो हमे सही निर्णय लेने मैं सहायता करती हैं। यदि हम आत्मा के सात चले तो सफ़लता निश्चित हैं।

अब आत्मा से धयान कैसे हों तो बड़ा सरळ हैं जो आत्मा को अच्छा लगे वह कार्य करना चाहिये। यदी आपका आत्मा कहता की हमे धयान करना है और ऐसे करना चाहिए तो बस सुरू कर दीजिए। यदी आपका आत्मा कहता हैं की हमे धयान करने से कोई लाभ नहीं है और मै इसे नहीं कर पाऊंगा तो मत कीजिये।

आपका आत्मा जीस कार्य मै लगता हों वही कार्य कीजिए उसी कार्य मैं आपको सफलता भी मिलेंगी और आप महानता को छु पाएंगे इसी मैं आपकी की भलाई है यदि आप आत्मा के बिरुद्ध जायेंगे तो कभी सफल नहीं होंगे। आप जिस कार्य के लिए बने वही कार्य कीजिए जिसके लिए परमात्मा ने आपको भेजा हैं।

अब दूसरा नियम आता हैं मन का और मन बड़ा चंचल हैं यह इतना चंचल क्यू हैं क्यूकि हम बाहरी बीसियों से बहुत अधिक आकर्सित होते हैं। यदि हम इसे अपने बस मैं कर ले तो हमारी सफलता निश्चित है। अपने बस मैं कहने का अर्थ हैं की आपने मन को अपने आत्मा के अधीन कर ले। यदि ऐसा हो जाय तो फिर कमाल हो जायेगा क्यूकि एक गाड़ी को योग डराइबर मिल जाय तो फिर एक्सीडेंट होगा ही नहीं।

अब तीसरा नीयम हैं इच्छा ,इच्छा एक ऐसी शक्ति हैं जो हमारा किसी भी कार्य को करने की छमता को बताता है किसी भी कार्य को पुरा करने के लिये इच्छा का होना जरूरी है यदि कोई कार्य करने की इच्छा ना हो और वही कार्य करें तो क्या वह कार्य पुरा होगा कभी नहीं।

किसी और की थोपी हुई इच्छा हमे कैसे फल सकता हैं कभी नहीं। इसलिए आप अपनी आत्मा की बात सुने अपनी मन की बात सुने उसी मैं आपकी भलाई हैं ओरो की बात ओरो के ऊपर छोड़ दे वह आपका नहीं है।

 अब मैं यह कहना चाहता हूँ की यहाँ धयान करने के लिए किस नीयम का पालन करना पड़ रहा है किसी नीयम का नहीं। आत्मा आपका ,मन आपका ,इच्छा आपका अब चाहें आप अपने आप को जिधर ले जाय यह आपके ऊपर निर्भर करता हैं।                                                                                                                                                                                                                         जय वासुदेव श्री कृष्ण        

Thursday, November 1, 2018

November 01, 2018

WHAT MEDITATION

                                          ध्यान क्या है  

धयान एक ऐसी परक्रिया है जहाँ हम एक गहरी नींद मैं चले जाते है जहाँ इस संसार की सारी अस्तितब समाप्त हो जाती है और केवळ मैं रह जाती है इस मैं को ही परमात्मा कहते है और इस क्रिया को ही परमात्मा का दर्सन होना कहा जाता हैं।

दर्शन का मतलब यह नहीं की आपको ब्रह्मा, बिस्णु, महेश दिखाई दे। धयान का वास्तिविक अर्थ खुद को जानना। खुद को जाने बिना इस संसार को ,इस संसार के नियम को नहीं जानना जा सकता। धयान ही वह रास्ता हैं जो इस प्रकृति को सहझने मैं सहायक है।

यदि आप प्रकृती को समहज गए तो बरम्हाण्ड को समहज गए जब बरम्हाण्ड को समहज गए तो खुद को समहज गए जब आप खुद को समहज गए तो परमात्मा  को समहज गए और परमात्मा  को समहज गए तो खुद को समहज गए और खुद को समहजना ही परमात्मा  को समहजने के बराबर है। 

क्याकि यहाँ  हर व्यक्ति परमात्मा ही है। और खुद को जाने बिना आप कभी भी महान नहीं बन सकते क्याकि सब कुछ हमारे भीतर है इसलिए भीतर उत्तरना जरुरी हैं और भीतर धयान के द्वारा ही उत्तररा जा सकता है। 

अब यहाँ धयान दो प्रकार की होति हैं एक वह धयान जो हम शांत बैठ कर करते हैं। और दूसरा वह धयान जब हम कोई कार्य ध्यान से करते हैं। दोनों को ही धयान कहा जाता हैं और दोनों ही परमात्मा तक जाती हैं। 

अब यह आप पर निर्भर करता हैं की आप कार्य कितना धयान से करते है जितना ही धयान की मात्रा होंगी उतना ही परमात्मा आपके भीतर उत्तपन होगा इसलिए कोई भी कार्य हमें धयान से करना चाहिए डूब कर करना चाहिये तभी सफलता मिलती है। जब तक कोई कार्य हम धयान से ना करें तब तक हम ना सफल हो सकते और ना ही हम महान बन सकते हैं।

पर्वत काटना बड़ा आसान कार्य हैं किन्तु धयान करना बड़ा मुश्किल कार्य हैं क्यूकि सारे दुनिया का लफड़ा अपने सर पर लिए घुम रहें हैं अब इतना बौझ उठाकर हम कितना दूर जा सकते है। गाड़ी बंगला और मकान या फिर सोना -चांदी गहना बस इतना ही दूर चल सकते हैं इस से आगे नहीं।

इसलिए हमें इन सब जंजीरों से छूटना होगा जब तक हमरे पास यह जंजीर हैं तब तक हम ना धयान कर सकते हैं और ना ही कोई कार्य हम धयान से कर सकते है।                              
                                                                                                             जय वासुदेव श्री कृष्ण                                                               
                                                 
                                                                             

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